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आतंकवाद-एक त्रासदी

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Terrorism
‘आतंक’ से भय का बोध होता है,व्यथा इसका पर्यायवाची है।परापूर्वकाल में राक्षस से देवता और मानव सभी आतंकित रहते थे। उन आतंकियों से मुक्ति दिलानेवाले को भगवान की उपाधि मिलती थी।
आतंकवाद शब्द से ही मन में एक अजीब सा भय समाहित हो जाता है। आतंकियों के प्रति अजीब घृणा,दहशत और उनकी नृशंसता से हृदय विदीर्ण हो जाता है। कानों में निर्दोष मानव की चीख सुनाई देने लगता है और भयानक शोर -बचाओ,रक्षा करो,मैने कोई गलती नहीं कि, मेरा कोई कसूर नहीं है,मुझे माफ कर दो, मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं, मेरी नवविवाहिता मेरी राह देख रही होगी, मेरा बूढ़ी माँ अपने श्रवण कुमार की बाट जोह रही होगी , मैं अपने माता- पिता का एक मात्र सहारा हूं,मेरे पति मेेरी राह देख रहे होंगे,भाई मुझे छोड़ दो,मेरे नहीं रहने से मेरे पति बच्चे,मेरे माता-पिता,सास-श्वसुर का क्या होगा ? वे तो जीवित रहते भी मृतप्राय हो जाएंगे। नवयुवक की करूण क्रन्दन कि मुझे छोड़ दो अभी मुझे अध्ययन करना है,माता-पिता के स्वप्न साकार करने हैं,देश में नाम कमाने हैं, नवयुवती-मेरी सुहाग मत उजाड़ो मैं कैसे जीवित रहूंगी।लेकिन इन आतंकियों को न किसी के रिश्ते से मतलब है न किसी के दर्द से ।आए दिन इस तरह की कितनी घटनाएँ घटती रहती हैं, जिसे हम समाचार पत्रों तथा दूरदर्शन के माध्यम से जान पाते हैं।आए दिन लगातार यह सब देखने से स्थिति एैसी हो गई है कि मेरे कानों में हमेशा बम के धमाके,गोलियों से छलनी होते मानव का कराहता स्वर गूंजता रहता है।और प्रतीत होता है कि सभी मेरे समक्ष खड़े हैं, अपने जीवनदान हेतु निवेदन करते हुए । मैं व्याकुल हाे जाती हूँ, काेई भी हाे,देशी या विदेशी, किसी भी धर्म का हो, मैं तड़प उठती हूँ, मैं क्या काेई भी इन्सान इसी तरह व्याकुल हो जाता होगा। लेकिन विवश है संसार का हर मनुष्य । आजकल आतंक बहुत अधिक बढ़ गया है। हर ओर भय का वातावरण व्याप्त है। पता नहीं कब क्या हो जाए,कौन निर्दोष किसी दानव के चपेट में न आ जाए। अजीब कशमकश में जी रहे हैं सभी। इन लोगाें का काेई अपना नहीं होता,जब ये स्वयं के नहीं हाेते,तो अऩ्य की क्या बात? न जेल जाने का भय, न मृत्यु का भय न बन्धु बान्धवाें से बिछड़ने का भय। मात्र एक लक्ष्य आतंक फैलाना , निर्दोष मानव की हत्या करना।
जिस तरह गन्दगी पर एक मक्खी से हजारों मक्खियां पनपती है ठीक उसी तरह ये आतंकवादी भी बिना कुछ जाने समझे अपने सरगनाओं के पीछे भागते रहते हैं जिनका न कोई उद्देश्य न धर्म न जाति होता है बस मात्र आकाओं के पीछे भागना ही अपना उद्देश्य होता है.
इन आतंकियों से कैसे मुक्ति मिलेगी, क्या करे मानव,कहाँ जाए आखिर,जहाँ शान्तिपूर्ण वातावरण हाे।
अभी कुछ दिन पहले बांगलादेश में आतंकियों के कहर से सारा देश दहल गया था। कितनी मर्मान्तक पीड़ा झेलनी पड़ी है मनुृष्याें काे। कुछ समय पूर्व पाकिस्तान में आतंकियों का ताण्डव,यदा कदा कश्मीर में निशाना बनाना , संसार के हर काेने काेने में आतंकियों का दहशत फैलाना अपना उद्देश्य वाली यह है कौन? हिन्दुस्तानी,पाकिस्तानी,सीरिया ,अफगास्तानी .…..। कोई भी हो है तो मानव ही, या मानव रुप में दानव जिसके अन्तः करण करुणा,प्रेम,माेह रहम,शान्ति ,मधुरता,परोपकारी प्रवृत्ति आदि का नितान्त अभाव हाेता है। ह्रदय में नफरत, द्वेष, कायरता, नृशंसता आदि अवगुणों से भरे हुए मानव।
आतंकवाद बनने के पीछे निश्चित रूप से तिरस्कार घृणा उपेक्षा रहा होगा। परिवार से उपेक्षित बच्चे बाहर मित्र की चाहत में गलत मित्र के चक्कर में पड़कर कुमार्ग कुसंगति में चला जाता है, नशा का शिकार हो जाता है। नशीली पदार्थ न मिलने पर चोरी तक कर डालता है, पकड़े जाने पर लांछित होने पर अधिकतर मनुष्य अपराधी बन जाता है। इस लत के कारण गलत धंधों में लिप्त हो जाता है। फलस्वरुप किसी अपराधियों के गिरोहों में फंसता ही चला जाता है। संभवतः वही दलदल कहीँ आतंकवाद के द्वार तक तो नही ले जाता। माता पिता की नासमझी,दो बच्चों में विभेद के कारण, या प्रेमिका द्वारा ठुकराया जाना या किसी अपने द्वारा प्रताड़ित मानव ऐसा निन्दनीय कदम उठा लेता है , बाद में चाहकर भी निकलना कठिन हो जाता होगा। आतंकवादी बनाने में समाज भी उत्तरदायी है।
मुझे लगता है वीडियो गेम भी इस मामले में कहीं न कहीं जिम्मेदार है. बहुतायत वीडियो गेम लड़ाई पर आधारित होती है. बन्दूक, गोली या तलवार इन गेमों के मुख्य अवयव रहता है. इस तरह के गेम मोबाइल पर लैपटॉप पर या गेम स्टेशन पर या गेम कैफे में अक्सर बच्चे व्यस्त दिखते हैं जिस कारण उन बाल मन में लड़ाई खौफ न रहकर मजा या आनंद देनेवाल क्रिया के रूप में स्थापित हो जाता है. ये जब बड़े होते हैं और उकसाने वाला गलत मेंटर मिल जाता है तो इन्हें आतंकबाद में आनंद आने लगता होगा !
जब आतंकवाद का आरम्भ हुआ होगा उस समय ही कठोरता के साथ साथ काउंसलिग भी किया जाता, पवित्रता का सही पाठ पढ़ाया जाता , जाति भेद यानी हिन्दू मुस्लिम सब एक हैं, सम्पूर्ण संसार एक है, ऐसा पाठ पढ़ाया जाता तो संभवतः आज इतनी भयानक स्थिति नहीं होता। यह मेरी सामान्य बुद्धि की उपज है , अन्यथा नहीं लिया जाय।
आज तो यह महामारी का रुप ले चुका है, भीषण समस्या है विश्व की। सब विवश हैं ।
आतंकवादियों का संगठन है , एक नहीं अनेकों संगठन हैं। इन सबके तथाकथित धर्म गुरु हैं , आका हैं ,भाई के नाम से विख्यात हैं। इन सबको पाठ पढ़ाया जाता है कि किस तरह मानव का अहित हो , दहशत कैसे फैलाया जा सके, किस तरह मानव की हत्या हो । समाज में किस तरह दहशत फैलाकर आत्मतुष्टि मिलती है
आतंकवादी के पकड़े या मारे जाने पर हमें तुष्टि मिलती है, आतंकी ढेर तो हो गया ,अच्छा है मारा गया , हमारे देश के वीर सपूतों ने अच्छा किया ,इन आतंकियों ने हमारे वीर जवानों का निर्दोष मनुष्यों का खून बहाया है ,इन रक्त पिपासुओं को मरते देखकर अात्म -संतुष्टि मिलती है ,लेकिन कभी कभी सुसुप्त मानवता जागरित हो उठती है ,पता नहीं किस मजबूरी में आतंकी बना , कहीं आर्थिक तंगी के कारण तो नहीं या किसी के प्रेम में छला तो नहीं गया था या अनजाने में ही सही परिवारीजनों के उपेक्षा के कारण नहीं तो ,किसी आत्मीय मित्र की कटुतापूर्ण वाणी के कारण तो नहीं ,या इनके सरगना के द्वारा किसी आत्मीय के बंधक बनाए जाने के कारण तो नहीं या धमकी के कारण या कोई विशेष मज़बूरी के कारण . अस्तु कोई भी कारण रहा हो .मन कभी – कभी करुणा से द्रवित हो जाता है ,वह भी तो किसी की सन्तान, किसी का सुहाग ,किसी का पिता या मित्र रहा होगा ,इस आत्म चिन्तन से व्यथित हो जाना स्वाभाविक ही है कि किसी के मौत पर प्रसन्न होना हृदयहीनता का ही परिचायक है लेकिन हमारे वीर सैनिक करें तो क्या करें कैसे अपनों को नहीं बचाएँ निर्दोष मानवों की कैसे रक्षा न करें ? यदि ऐसा नहीं करेंगे, नहीं मारेंगे तो, हमारे देश के मानव कैसे सुरक्षित रह पायेंगे ? उनकी मजबूरी है, प्रशासन ऐसा नहीं करेंगे तो और भी निर्दोष जनता इन नर पिशाचों से , आतंकियों के द्वारा मारे जाएँगे, और भी दहशत फैलेगा। हम कैसे भूल सकते हैं मुंबई,दिल्ली या अन्य शहरों के निर्दोष अपनों को,उन शहीदों को जिसने देश की रक्षार्थ अपनी जान की परवाह नहीं करके अपनी बली दे दी, उन पीड़ित छटपटाते परिवार को बिलखते परिजनों को .
करें तो करें क्या ? सम्पूर्ण संसार विवश है ,अशांत है ,दहशत में है ,सदा आतंकित है ,पता नहीं कब क्या करे ये कट्टर पंथी , इनकी क्रूर आचरण से भयाक्रांत है कि इन दरिंदों का अगला कदम क्या होगा ?
कश्मीर के नागरिक की स्थिति तो और भी भयावह है ,सदा वे सब इन क्रूरता के शिकार होते रहे हैं ,लेकिन सलाम है हमारे अपने कश्मीर वाशियों को,उनके साहस और धैर्य को वीर सैनिकों को जिन्होंने सदा अपने अपूर्व साहस और कौशलों से डटकर मुकाबला किया, उन सभी भाई बहनो को नमन !
यदि हम संसार के समस्त प्राणी ,सभी नेता लोग दिखावे से नहीं ह्रदय से मिलकर एकजुट होकर इनलोगों से बातें करें ,इनकी समस्या को सुने,इनकी जायज मांग को सुनकर समाधान करने का अथक प्रयत्न करें,अपने होने का अहसास करवायें ,वास्ता दें ,गुजारिश करें तो सम्भवतः इनलोगों का ह्रदय परिवर्तन हो, तो कहीं इस समस्या का समाधान हो पाये , और हम बिना डरे अपना जीवन यापन कर सकें ,अपनों के खोने के भय से मुक्त होकर जीवन आनन्दपूर्वक जीने की अभिलाषा करें
आइये सब मिलकर प्रार्थना करें कि आतंकवादियों का ह्रदय परिवर्तन हो ,और हम सबका जीवन सुखमय हो .शान्ति के परिचायक भारत के साथ साथ सम्पूर्ण विश्व शान्ति का अनुभव करे जो हर मानव का अधिकार है.

डा. रजनीदुर्गेश

Web Title : आतंकवाद-एक त्रासदी



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