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तुम क्या जानो, मैंने यह जीवन कैसे बितायी है

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तुम क्या जानो, मैंने यह जीवन कैसे बितायी है,
गोद में लेने को, मेरा मन कैसे ललचाई है ।

संस्कार के बंधन में जकड़ी
स्वनिर्मित जाल में फंसी ज्यों मकड़ी
तड़पती जैसे जल बिन मछली
जीवन के हर पल हर दिन झेली
कौन्तेय अभिधान देने को
मिथ्या बंधन, मिथ्या रीत निभाई मैंने
दंश अपनों के सह-सह , जीवन बितायी मैंने
तुम क्या जानो, मैंने यह जीवन कैसे बितायी है,
गोद में लेने को, मेरा मन कैसे ललचाई है ।

द्रौपदी का लज्जित होना
नीति नैया डूबते देख
कुल की लाज बुझते देख
विवश पूर्वजों का सर झुकाना
तुम उसे बचाओगे, नीति को अपनाओगे
यह सोच निष्फल हो जाती है
करूण क्रन्दन से आत्मा मेरी पछताती है
तुम क्या जानो, मैंने यह जीवन कैसे बितायी है,
गोद में लेने को, मेरा मन कैसे ललचाई है ।

अपनाने का मन करता था
द्वार-पट खोलने को ललचाता था
आकुल हो तुम्हें पुकार बाहों में समाना था
उठ ऊँचा हर बंधन से हृदय पीड़ा मिटाना था
तुम मेरे थे, तुम मेरे हो यह सबको बतलाना था
विवश मैं भयपूर्ण थी, खो न दूं यह डर था
निहार सकूँ दूर से भली आत्मा उद्वेलित था
तुम क्या जानो, मैंने यह जीवन कैसे बितायी है,
गोद में लेने को, मेरा मन कैसे ललचाई है ।

सारा जीवन तुझमें ही
अपना अक्स देखा है
अश्रु साक्षी मेरी व्यथा का
खोकर वजूद अपना
ताउम्र अकेले बितायी है
तुम क्या जानो, मैंने यह जीवन कैसे बितायी है,
गोद में लेने को, मेरा मन कैसे ललचाई है ।

रक्तांश अपना, षड्यंत्र शत्रुओं का
सम्मिलित उसमें तुझे देख
कितनी पीड़ा झेली है
तुम क्या जानो, मैंने यह जीवन कैसे बितायी है,
गोद में लेने को, मेरा मन कैसे ललचाई है ।

Web Title : तुम क्या जानो, मैंने यह जीवन कैसे बितायी है



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PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
July 4, 2016

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