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नाम की राजनीति

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प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता ऋषि कपूर ने इस मांग की प्रतिक्रिया ट्विटर पर देते हुए, गांधी परिवार के नाम पर देश भर के कई महत्वपूर्ण संस्थानों, पुरस्कारों, जगहों का नामकरण किए जाने को लेकर अपनी आपत्ति जाहिर की.कपूर का कहना है कि देश के लिए महत्वपूर्ण चीजों का नाम उन लोगों के नाम पर रखा जाना चाहिए जिन्होंने देश के प्रति बड़े योगदान दिए हों. जैसे राज कपूर ने जीते जी और मरने के बाद भी सालों साल पूरी दुनिया में भारत का नाम ऊंचा किया.
यह आपत्ति उन्होंने क्यों की यह तो वही जाने, परन्तु उन्हीके अनुसार ‘महत्व्पूर्ण चीजों का नाम उन लोगों के नाम पर रखा जाना चाहिए जिन्होंने देश के प्रति बड़े योगदान दिए है’ ऋषि कपूर यह तो नहीं कहना चाहते है कि गांधी परिवार का इस देश के प्रति कोई बड़ा योगदान ही नहीं है? अगर ऐसा कहना चाहते हैं तो मुझे लगता है की उनको अपने ज्ञान में बढ़ोतरी करनी चाहिए .
वे बहुत अच्छे कलाकार हैं और यह कलाकारिता भी उन्हें वैसे ही विरासत में मिली है जैसे इंदिरा,राजीव, सोनिया को अपने पूर्वज नेहरु से राजनीति विरासत में मिली. काबिल ऋषि कपूर भी हैं , पर जो हुनर उनके पास है वह विरासत में श्री राज कपूर से मिली है. ठीक उसी तरह गांधी परिवार की भी बात है. इंदिराजी में काबिलियत था, राजीवजी में भी था .
अतः जब इन गांधी परिवार की योगदान की बात की जाये तो यह भी सोचा जाय की इंदिरा और राजीव दोनों शहीद भी है. नेहरू देश के प्रथम प्रधान मंत्री और स्वतंत्रता सेनानी भी थे. इन सभी गांधियों के देश के लिए क्या योगदान है यह देश का बच्चा-बच्चा जानता है और इतिहास भी गवाह है. कांग्रेस शासन भी देश में बहुत दिनों तक रही है तो यह भी स्वाभाविक ही है कि उनके प्रधान मंत्री के नाम पर बहुत सारी योजनएं भी रहेगी ही. ६० वर्ष तक जिसके हाथ सत्ता थी वह तो अपने प्रमुख के नाम पर योजनाओं को लाया ही है , २४ महीने के सत्ता में भी देखें तो पंडित दीन दयाल, एस.पी. .मुखर्जी , पंडित मदन मोहन मालवीय और कांग्रेस विरोधी जयप्रकाश नारायण, उत्तम राव पाटिल , श्यामा प्रसाद मुखर्जी , प्रमोद महाजन तथा मोतिरञ्जी लहाने के नाम पर योजनाएं शुरू की गयी है.
ये अलग बात है कि किसी खास उद्देश्य से कोई कांग्रेस का विरोध कर रहा हो और कुछ न कुछ ऐसा करने से सम्भवतः कहीं से लाभान्वित होने की आशा हो तो आप कुछ भी बोलें, बोलते-बोलते यह भी बोल जाएँ जो मर्यादित भाषा की श्रेणी से पृथक हो. अच्छे भाषा या मर्यादित भाषा में शायद यह कहना कि ‘किसी के बाप का नहीं है’ उचित नहीं होता है. यही वाक्य कोई उनके लिए प्रयोग करे तो उन्हें भी ठेस पहुंचेगा !
ऋषि कपूर सम्भतः चर्चा में आने के लिए इस मुद्दा को लेकर आएं हैं. उन्हें अगर सच में देश की चिंता होती तो आज की सबसे भीषण समस्या जिससे सारा देश जूझ रहा है वह है -पानी! पर यह विषय शायद उनको महत्व्पूर्ण नहीं लगा.
वैसे आजकल यह देखने में आ रहा है कि जो कांग्रेस का विरोध करेगा, कहीं न कहीं उसे किसी न किसी माध्यम से सम्मानित होने का अवसर मिलेगा. ऐसा ही सोच श्री ऋषि कपूर जी का तो नहीं? क्या वे अनुपम खेर की राह का नक़ल तो नहीं करना चाहते ? जो भी हो, नाम की राजनीति का प्रचलन इस देश में बहुत दिनों से है. नाम बदलने की राजनीति भी पुरानी है. मद्रास को चेन्नई , बॉम्बे को मुंबई , त्रिवेंद्रम को थिरुवनंतपुरम, कैलकटा को कोलकाता और इतना ही नहीं, सुकरात और अलेग्जेंडर का भी हिंदीकरण हुआ ही है. इंडिया भी भारत है. अतः नाम की राजनीति पुरानी है और इसका माइलेज लोगों ने लिया भी है, तो ऋषि कपूर जी का प्रयास करना उचित ही है.
थोड़ा आश्चर्य यह जरूर लगा की 50 + के ऋषि कपूरजी को आज ही यह क्यों याद आया, उन्होंने पहले कभी इस मुद्दा को क्यों नहीं उठाया? ऐसा तो नहीं की उस समय जब कांग्रेस सत्ता में थे तब इस तरह की मुद्दा उठाने से उन्हें लाभ से ज्यादा हानि का डर था?
अब यह भी सोचने वाली बात है कि पुरानी नामों को बदलने से कितनी धन राशि की व्यर्थ व्यय होगा? नाम में क्या रखा है ऋषि कपूर जी ! अब आनेवाली योजनाओं तथा स्मारकों या पार्कों का नाम उन गांधी परिवार से न रखिये कोई बात नहीं, अब जिसके बाप का राज है उसीके नाम पे रखिये या किसी और के नाम पर रखिये पर नाम बदलने से होने वाली व्यर्थ व्यय को देखते हुए बदलने की बात को छोड़ दीजिये.
नाम बदलने या नाम रखने से कोई बड़ा या छोटा नहीं हो जाता है. और अच्छा मुद्दा खोजिए और ट्वीट कीजिये जो आप को ज्यादा शोभा दे और कपूर परिवार की इज्जत और सम्मान बढ़ाये.

Web Title : नाम की राजनीति



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