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सबका साथ सबका विकास

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राम,सीता,राधा,कृष्ण,अल्लाह,यीशु ये सभी देवताओं, ख़ुदा और प्रभुओं के नाम हैं. इन्ही नामों से ये जाने जाते हैं. इनकी जाति इनसे कोई नहीं पूछता ! इनका कोई भी उपनाम,सरनेम या गोत्र की चर्चा कहीं दीखता नहीं है. तो क्या इनका परिचय कठिन है ? इन्हें सभी पहचान जाते हैं चाहे वे विश्व के किसी कोने में क्यों न रहते हों. तब आखिर मनुष्य को उपनाम या जाति की आवश्यकता क्यों है? मनुष्य की तो एक ही जाति होनी चाहिए – मनुष्यता ! धर्म होनी चाहिए – मानवता ! प्रमुखतः आज के परिपेक्ष्य में उपनाम और जाति की कोई उपयोगिता नहीं है. उनकी पहचान आधुनिक तरीके से होती है. उनके पास परिचय पत्र तो होता ही है वह भी ‘बायो-मेट्रिक’ , फिर उनकी जाति या उनका उपनाम किसलिए?

आज भी जो जातिगत कुंठाओं से ऊपर उठ चुकें हैं उनके नामों में कोई उपनाम नहीं है, उनसे कोई उनकी जाति नहीं पूछता जैसे कि बाबा राम देव , श्रीश्री रविशंकर , सुधांशु महाराज, चिन्मयानन्द,मोरारी बापू इत्यादि. इनके नामों में कोई उपनाम भी नहीं है. शायद इनके पासपोर्ट में हों पर प्रचलित नामों में या इनके पहचान के नामों से इनकी जाति या गोत्र आदि पता नहीं चलता है. वस्तुतः ये सभी लोग धर्म से बंटने वाली स्थिति से ऊपर उठ चुके हैं अतः इनका न कोई उपनाम है न इनके नामों से किसी जाति का उल्लेख प्राप्त होता है.
वास्तव में यह विचारणीय प्रश्न है . इसपर समाज को मंथन करने की आवश्यकता है. उपनाम तो मानव-मन की उपज है. मात्र स्वार्थपूर्ति के कारण ही ऐसा हुआ होगा. चलो विभक्त करो समाज को.

मेरी दृष्टि में उस काल में जो सशक्त लोग होंगे , वे अपनी आवश्यकता अनुसार उपनाम शब्द जोड़कर समाज में एक भ्रान्ति सृजित कर अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु ऐसा कार्य कर दिया होगा. उन्हें यह आभास भी नहीं होगा उनकी यह भूल समाज के लिए इतनी बड़ी समस्या बन कर उभरेगा .यह विकराल समस्या है .यदि यह नहीं होता तो समाज में कुरीतियाँ नहीं होती , हिंदुस्तान पाकिस्तान में बंटवारा नहीं होता ,बंटवारे में इतना नरसंहार नहीं होता ,गुजरात दंगा नहीं होता पंजाब में ऐसी कारुणिक घटना नहीं हुई होती ,कोई भी दारुण घटनाएँ नहीं हुई होती ,आरक्षण रुपी महामारी तो नहीं ही हुई होती ,आज हर वर्ग के बच्चे लाभान्वित होते ,भेद -भाव रहित होकर समाज के प्रत्येक वर्ग के मानव को गुण और कर्म के आधार पर नौकरी मिलती .प्रतिदिन समाचार -पत्रों में विभत्स घटनाएँ पढ़ने को नहीं मिलती .दूरदर्शन या रेडियो पर कारुणिक घटनाएँ देखने सुनने को नहीं मिलती .समाज में जाति को श्रेष्ठ नहीं माना जाता, गुणों की महत्ता होती . हमारे कश्मीर के लोगों को दहशत में नहीं जीना पड़ता . ”सबका साथ सबका विकास’ वास्तव में होता . हर मानव में समानता होती .वे खुली हवा में साँस ले पाते ,कोई जाति बंधन नहीं होता . आज नेता लोग स्वार्थवश अपनी रोटी सेंकने में लगे हैं, यह नहीं होता .बाल्यकाल से ही यह अहम नहीं होता कि हम अमुक जाति के हैं , हमें विशेष दर्जा प्राप्त है , हम सबसे श्रेष्ठ हैं ,ऐसे सोच विकसित ही नहीं होते . हम अमुक जाति के हैं हम जैसे भी अध्ययन करें नौकरी तो मुझे मिलनी ही है ,यह सोच नहीं पनपता . वरन हर नागरिक में कुछ करने की तमन्ना होती , वे अध्ययन पूर्ण मनोयोग से करते जिससे मनोनुकूल नौकरी मिल सके .परिवार के साथ देश में नाम अंकित करने की चाह होती . आज बच्चे आहत हैं कुछ भी करो आरक्षण रुपी दानव के कारण हमें तो पीछे रहना ही है . यदि जाति बंधन प्रदर्शित करने की प्रथा नहीं होती तो देश के बच्चों में अदम्य उत्साह होता . वे बंद खिड़कियों में अपने को बंद होने का अहसास नहीं करते वरन खुली खिड़कियों में अपने गुण रुपी उपनाम से विभूषित होकर आज़ाद पक्षियों की तरह विचरण करते . हार्दिक पटेल की तरह पटेल समुदाय के लिए आवाज़ नहीं उठाते. कन्हैया की तरह आज़ादी की आवाज़ नहीं लगाते.

सरकार भी नहीं चाहती कि हमारे देश की जनता जात-पात की जंजीरों से मुक्त होकर ऊपर उठकर मात्र हिंदुस्तानी के रूप में परिचित हों ,विद्यालय में नमांकन करवाने जाओ तो वहाँ एक फॉर्म भरनी पड़ती है जिसमें आपको लिखना पड़ता है – आप किस जाति से हैं , आपका धर्म क्या है ,ऐसा क्यों ? पहचान के लिए उसकी जाति या धर्म की आवश्यकता क्यों है ? यह विद्यालयों तक ही सीमित न रहकर हर सरकारी कार्यालयों में किसी भी तरह का आवेदन निवेदन के फॉर्मों में जाति या धर्म का उल्लेख अनिवार्य कर दिया गया है ,और यही कारण है कि भारत में बच्चों को बचपन में ही उनके नाम के साथ -साथ उनकी जाति और धर्म क्या है ,यह हर अभिभावक बताने का कार्य करते है फलतः बीजारोपण यहीं से आरम्भ हो जाता है .

कथनी तो यह है कि “बसुधैव कुटुम्बकम ” विश्व बन्धुत्व् की बात करेंगे , हम हिंदुस्तानी भाई-भाई कहेंगे पर करनी ऐसी- हर सरकारी क्रियाकलाप में जाति और धर्म का उल्लेख कर “एक हिंदुस्तानी” को विभिन्न जाति ,धर्म में बाँट दिया जाता है. और यही ऊंच-नीच, अगरा- पिछड़ा , जनजाति ,अनुसूचित जाति, इत्यादि अनेकों भाग में विभक्त कर देते हैं.
यह विभक्ति क्यों किया जाता है, ऐसे प्रश्न का उत्तर शासक लोग कभी नहीं देंगे , क्योंकि बांटकर ही तो इनकी शासन चलती है. तभी तो हमने ये कभी नहीं सुना है कि किसी राजनेता ने संसद में यह प्रश्न नहीं उठाया कि जाति से पहचान के तरीके का इस देश से उन्मूलन किया जाय.
जैसे ही जाति और उपनाम से पहचान को गैर क़ानूनी घोषित कर दिया जायेगा वैसे ही बांटने और बंटने कि प्रक्रिया बंद हो जाएगी. सामाजिक कुरीतियां नष्ट हो जाएगी. जातिगत, सामुदायिक एवं धार्मिक द्वेष का अंत हो जायेगा. न कहीं हिन्दू-मुस्लिम की लड़ाई होगी न अगड़ों -पिछड़ों के मध्य मतभेद. न जाति और धर्म के नाम पर वोट बटोरनेवाले कुपात्र नेता शासन सत्ता में पहुँच पाएंगे, और वस्तुतः तभी हम एक हिंदुस्तानी बन पाएंगे. मैं सभी विकासशील , सच्चे हिंदुस्तानी तथा प्रगतिशील समाजवादी सम्प्रदाय विरोधी और वास्तव में सम्पूर्ण भारतीयों से आग्रह करती हूँ कि अपने तथा अपने बच्चों के नाम से उपनाम हटा दें. और कहीं भी किसी भी स्थान में ‘धर्म’ लिखने कि मज़बूरी हो तो उसके आगे” मानवीयता” लिखें, जाति लिखने कि आवश्यकता हो तो उसके आगे ” मानव” लिखें.

मुझे विश्वास है इस तरह के परिवर्तन आने पर हम हिंदुस्तानी अतिशीघ्र ही विश्वगुरु बनने का सपना साकार कर पाएंगे तथा प्रेम , सहानुभूति , उदारता एवं भाईचारे का जन्म होगा जिससे समाज में समरसता, एकता एवं सुखद अनुभूतियों की वृद्धि होगी.



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