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व्यथा - कैकेयी की

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किसी भी कथा में एक नायक, एक नायिका एवं एक खलनायक या खलनायिका का होना आवश्यक होता है. यह कथा ही नहीं वास्तविक जीवन में भी अपने आस-पास या देश दुनियां में भी एक दूसरे को दिखता है. हर कोई अपने को नायक समझता है और शेष बचे लोग जो भी उसके जीवन में होते हैं वे या तो सहनायक, या खलनायक या अदद पात्र होते हैं, फिर चाहे वह घर हो समाज हो ,गावं हो,सहर हो, राज्य हो, राष्ट्र हो या विश्व ही क्यों न हो. कथा जो कहीं न कहीं सत्य या वास्तविकता के समीप होता है. भले वह काल्पनिक ही क्यों न हो उसमें भी कहीं न कहीं किसी न किसी घटना का प्रभाव अवश्य रहता है. प्रभाव, लिखने वाले के मष्तिस्क पर स्वयं तथा स्वतः पड़ी हो या कहीं किसी के द्वारा श्रुत होने से पड़ी हो.
बचपन से हमारा समाज हमारे मन में यह बैठाने का काम करता है कि ‘नायक’ वह होता है जो सुन्दर हो , अच्छा हो और अच्छा काम करता हो. खलनायक वह ,जो देखने में भी असुंदर ही नहीं कुरूप हो और काम भी अच्छा न करता हो. अच्छा काम करने वालों के विरुद्ध हो . अतः लेखक भी जब पात्र का विश्लेषण करता है तो वह खलनायक को कुरूप तथा बुरा कार्य (कर्म) करने वाले के रूप में दिखता है , यही कारण है कि अधिकतर खलनायक का चरित्र ही नहीं चित्र भी हर विधा में असुंदर दिखया जाता है. कुछ ऐसा ही रामायण के एक पात्र ‘मंथरा’ को दिखाया गया है. वह सूत्रधार थीं कैकेयी को बाध्य करने में. उसे खलनायिका के रूप में प्रस्तुत करना था तो उसे कुबड़ा दिखाया गया था. जब की वह प्रत्यक्ष में या मुख्य भूमिका में नहीं थी पर कैकेयी तो महारानी थी और बहुत अच्छी थी अतः और उसे मुख्य खलनायिका न दिखाकर एक सहखलनायिका का सहयोग दे दिया गया था.
कैकेयी स्वयं में पूर्ण थी , सुन्दर थी , रानी थी वह खलनायिका कैसे हो सकती थी. वह दशरथ की सबसे ज्यादा प्यारी भी थी. कौसल्या एवं सुमित्रा भी उससे बहुत प्यार करती थी . राम तो उसके लिए सबसे ज्यादा प्यारा था. यह कोई क्यों नहीं मानना चाहता है की माँ आखिर माँ होती है और स्वभावतः वह अपने कोख जाया को ज्यादा प्यार करती है. वही जब अपने पुत्र से ज्यादा किसी और को प्यार करे तो लोग अंगुली उठाते हैं , कहते हैं -कैसी माँ है? अपने पुत्र से अधिक कैसे किसी और से प्यार कर सकती है.
माँ तो माँ होती है विमाता हो या जन्मदायिनी . पिता तो एक ही थे. राम का हो या भरत का . राम तो ऐसे पुत्र थे जिन्होंने कैकेयी को ज्यादा महत्व दिया था. वह सभी माता में ‘माँ’ देखते थे , कभी विभेद नहीं करते थे. पर सदैव कैकयी से ही परामर्श लिया करते थे. वह जानते थे की माता कैकेयी बुद्धिमती हैं और सदा उचित परामर्श ही देंगी.
फिर यह अनर्थ कैसे हुआ कि राम के बदले भरत राजा बनें? इसका भागीदार लेखकों ने माता कैकेयी को बताया है. जरा गौर करें क्या इसके असली जिम्मेदार दशरथ नहीं थे? लेखक खुद ही लिखते हैं की राजा दशरथ ने कैकेयी को वचन दिया था , एक जगह यह उद्धृत है की राजा दशरथ ने कैकेयी के पिता को वचन दिया था की – कैकेयी का पुत्र ही राजा बनेगा. यह भी लिखा गया है कि “रघुकुल रीत सदा चली आयी , प्राण जाये पर वचन न जायी’ . यह विस्मरण कैसे हो गया दशरथ को कि जो वचन उन्होंने दिया है उसे उन्हें निभाना भी है.
जब विवाह करनी थी तब तो वह यह सोच रहे थे की कौसल्या को तो पुत्र हुआ ही नहीं ( उस समय पुत्र न होने का दोष महिलाओं का होता होगा ) अब कैकेयी से शादी करने के बाद तो उससे ही पुत्र होगा अतः वचन देने में कोई कठिनता नहीं है, सहज ही निभाया जा सकेगा. और कैकेयी के पिता भी संतुष्ट हो गए कि चलो मेरा ही दौहित्र राजा बनेगा , अतः शादी करा दी जाये.
कैकेयी , विवहोपरांत दशरथ की अतिप्रिय रानी थी. दशरथ पर सबसे ज्यादा अधिकार वह अपना ही समझती थीं. रानी कैकेयी इनके राजकार्य में भी यदा-कदा सलाह देती रहती थी और इनके सूझ-बूझ से दशरथ भी प्रशन्न रहते थे. वह वीरांगना भी थी , तभी तो सारथी बनी थी दशरथ की और रथ के पहिये को संभाल कर दशरथ को देवासुर संग्राम में विजयी बनाया था. फिर पुनः दशरथ वचनबद्ध हो गए थे.
कैकेयी वीरांगना थीं, बुद्धिमती थीं तो उनका महत्वाकांक्षी होना भी स्वाभाविक ही था. कौन नहीं चाहता की उसका पुत्र ही राजा बने. कैकेयी की नज़र में राम श्रेष्ठ जरूर थे लेकिन हर कोई चाहता है कि अयोग्य भी हो तो उसका ही पुत्र पद प्राप्त करे, जब की यहाँ भरत तो सुयोग्य थे. किसी राजमाता का यह चाहना की उसका ही पुत्र राजा बने कैसे गलत हो सकता है? और यहाँ तो दशरथ ने वचन भी दिया था की कैकेयी का पुत्र राजा बनेगा. फिर उनका यह चाहना की भरत राजा बने कैसे गलत ?
शादी के समय से ही कैकेयी के अंतःकरण में यह बसा हुआ था की मेरा पुत्र अयोध्या का राजा बनेगा और मैं राजमाता बनूँगी. व्यवहारिक रूप से उन्हें भी लग रहा था की ज्येष्ठ पुत्र तो राम ही हैं और व्यवहार है परंपरा है की ज्येष्ठ पुत्र राजा बनता है, तभी तो उनकी सहानुभूति राम के प्रति ज्यादा थी अतः व्यव्हार में कैकेयी राम से बहुत प्यार करती है . उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि दशरथ ने जो गलत वचन दिए हैं और जिस वजह से राम राज्याधिकारी होते हुए भी राज्य नहीं पा सकेगा यह राम के प्रति गलत है. पर उनके दिल एवं दिमाग पर छा गया था की रघु कुल में वचन निभाने हेतु लोग प्राण दे देते हैं ! इन वचन से बंधे होने के कारण राम राजा नहीं बन पायेगा. यह सहानुभूति ही कैकेयी को राम के साथ अधिक प्रेम करने हेतु बाध्य करता था.
वह निश्चिन्त थी , विश्वस्त थी कि राजा तो भरत ही बनेगा. मंथरा जब कभी उन्हें उकसाती थी तो वह उसे डाँट देती थी , वह जानती थी की राजा तो भरत ही बनेगा तो फिर इस दासी की बात में आकर उतावली क्यों बनूँ? पर मंथरा बार-बार उन्हें इसकी याद दिलाती थी , संभवतः वह दशरथ के पुत्र राम के प्रति अत्यधिक मोह को देखकर डर जाती थी और कैकेयी को पुनः -पुनः उकसाती थी , पर कैकेयी वचन की महत्ता वह भी रघुकुल में वचन की महत्व को समझती थी और यही वजह था की मंथरा बार -बार कैकेयी द्वारा अपमानित होती थी. राम का व्यवहार इतना अच्छा था कि वह भी राम से बहुत प्यार करती थी , भरत से भी अधिक. लेकिन राज्य मोह! कहा जाता है – धन शोक से बड़ा शोक कुछ भी नहीं होता है. विडम्बना यह भी की दासी मंथरा सदा साथ रहती थी और उन्हें बार-बार यह याद दिलाती रहती थी.

अचानक जब कैकेयी को ज्ञात होता है कि दशरथ अपने वचन के विरुद्ध जा रहे हैं तो वह अपना आप खो देती है. स्वाभाविक है . कोई भी स्तब्ध हो जायेगा. और फिर उत्तेजना में कोई भी कुछ भी करेगा. अतः जब कैकेयी ने देखा की दशरथ अपने कुल के रीत के विरुद्ध जा कर राम को राजा बनाने की सोच कर दिए हुए वचन नहीं निभा रहे हैं तो वह क्रोधीत हुयी जो स्वाभाविक ही है. पुनः मंथरा उसे सुझाती है की उसके पास एक और उपाय बचा हुआ है जिससे वह रघुकुल की पुत्रवधु होने का कर्तव्य निभा सकती है और साथ-साथ अपने पुत्र भारत को राजा बना सकती है. वह याद दिलाती है ‘देवासुर संग्राम’ की और समझाती है की यही समय है उनसे वर के रूप में अपने भरत की राज्याभिषेक करवाने की. खुद कैकेयी सोचती है की -इस तरह भरत राजा भी बन जायेगा और रघुकुल की रीत पर भी आंच नहीं आएगी. फिर कुल की इज्जत बचाना तो हर कुलवधू का प्रथम कर्तव्य होता है. तो मैं माँ और कुलवधू दोनों की सही भूमिका निभा पाऊँगी.
और फिर जब वह अपना कर्तव्य निर्वाह करती है तो बदले में उसे क्या मिलता है? घर , परिवार और यहाँ तक कि खुद का बेटा भरत भी उससे घृणा करने लगता है. होम करते हाथ जल जाता है कैकेयी का. वह सभी से दुत्कारी जाती है. कोई यह समझने का प्रयाश नहीं करता की वह तो पहले रघुकुल की मर्यादा बचाकर सच्ची कुलवधू बनाना चाहती थी और साथ में माँ का कर्तव्य भी निभाना चाहती थी. पर प्रथम था कुल का मर्यादा .
कैकेयी की व्यथा कोई नहीं समझ पा रहा. उसने मर्यादा हेतु पति खोया. राम , जिसे वह प्राण से ज्यादा प्यार करती थी उसे दूर करना पड़ा और भरत जो उसके कोख से पैदा हुआ था , उसने भी मुंह मोड़ लिया. वह भी उसे गलत समझने लगा.
यह कोई क्यों नहीं मानता कि कुल की मर्यादा प्रथम है. अगर दशरथ अपनी वचन तोड़ देते तो क्या आज कोई भी ‘रघुकुल रीत सदा चली आयी, प्राण जाये पर वचन न जायी ‘ कह पाता ? फिर जहाँ कैकेयी की प्रशंसा होनी चाहिए थी वहां उनको लोग खलनायिका के रूप में देखते हैं और यह कैकयी के लिए यही सबसे बड़ी व्यथा है.

Web Title : व्यथा - कैकेयी की



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
March 25, 2016

प्रिय दुर्गेश जी अनेक प्रश्न उठाती रचना बहुत अच्छी रचना

sadguruji के द्वारा
March 24, 2016

आदरणीया रजनी दुर्गेश जी ! महारानी कैकेयी के नजरिये को यथार्थवादी और सही ढंग से प्रस्तुत करने के लिए आपका बहत बहुत अभिनन्दन ! होली की बधाई स्वीकार कीजिये ! मंच पर अच्छी और विचारणीय प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

nishamittal के द्वारा
March 20, 2016

कैकयी के चरित्र को सुंदर ढंग से उभारा है आपने ,सुंदर लेख


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