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नारी-हत्या और महिला दिवस

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हत्या केवल शारीरिक ही नहीं होती. मानसिक हत्या शारीरिक हत्या से ज्यादा कष्टकर होता है. और नारियों को दोनों तरह की हत्याओं से गुजरना पड़ता है. शारीरिक हत्या में हत्या से तत्काल पहले मात्र कष्ट होता होगा लेकिन वहीँ मानसिक हत्या हो तो ताउम्र कष्ट और लांछनों से सम्मुख होते हुए गुजारना पड़ता है. प्रताड़ना , उपेक्षा , अवहेलना के साथ-साथ अनेकों और अनगनित कष्टों से गुजरते हुए उसे बार-बार मौत से भी बदतर जिंदगी गुजारनी पड़ती है. यहाँ मानसिक हत्या से मेरा सम्बन्ध ‘ब्रेन डेड’ से नहीं है. ब्रेन डेड से तो मनुष्य एक तरह की समाधी में होता है , और समाधिस्थ को क्या कष्ट ! अतः मेरा सम्बन्ध तो उस तरह की हत्या से है जो वस्तुतः आज ही नहीं बल्कि परापूर्व काल से हमारे देश और समाज के महिलाओं को झेलना पड़ रहा है.
जब इंद्र अपना मेकप (रूप बदल कर ) गौतम ऋषि जैसा बनकर अहिल्या देवी के साथ सम्बन्ध स्थापित कर लेता है तो उस काल में भी सजा अहिल्या (नारी) को ही मिलती है , और सजा भी कितनी भयावह कि उसे पाषाण (पत्थर ) बन कर रहना पड़ता है. वो तो समाज सुधारक राम आते हैं और पुनः उनहें समाज में इज्जत दिलाते हैं.
आज भी किसी कारण वश कोई नारी पति के अलावा किसी और पुरुष द्वारा छली जाती है और यदा कदा गर्भवती हो जाती है तो उसे ही दंड भोगना पड़ता है और पुरुष जिसने पाप (अपराध) किया है वह निःसंकोच,निर्भय और प्रतिष्ठित रह जाता है !?
हाँ , मैं उस हत्या की बात करना चाहती हूँ जो आये दिन हमारे देश के हर समाचार का मुख्य अंश होता है चाहे वह समाचार-पत्र हो या इलेक्ट्रॉनिक मिडिया . मुख्य पृष्ठ पर महिला हत्या (मानसिक या शारीरक) के सम्बन्ध में समाचार प्रकाशित होता है उन विश्लेषणों के साथ की कैसे , किसने (अनजान) और किसको किस नायाब तरीके से हत्या की है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो रिकंस्ट्रक्शन का चलन है , जो आपको फिल्मों की तरह दिखाया जाता है. खैर मैं यहाँ इन मिडिया का विरोध करने नहीं बैठी हूँ , परन्तु मेरा उद्देश्य है की महिला या नारी हत्या जो हमारे समाज की कोढ़ है, उस सम्बन्ध में चर्चा करूँ.
नारी की सामाजिक हत्या !
‘नारी’ को हत्या करने की पहली कोशिश उसे भ्रूण में ही हत्या कर देने की होती है. और यदि बच गयी तो कुकर्मियों द्वारा पुनः उसे बलात्कारित कर जीते जी मार देने का प्रयास होता है. वह कुकर्मी आज के समय में कोई भी हो सकता है – पडोसी, मनचले,सहपाठी,शिक्षक, और तो और वह हत्यारा बाप या भाई भी हो सकता है. फिर भी किसी तरह बच गयी तो विवाह के समय दहेज़ के धारदार हथियार से हत्या, और वहां से भाग निकली तो विवाहोपरांत दहेज़ कम मिलने के नाम पर हत्या. यहाँ हत्यारा – सास (महिला),श्वसुर, देवर, देवरानी(महिला) या ननद(महिला), कोई भी हो सकती है, कभी -कभी तो पति (जिसे वह बेचारी जीवन साथी मानती है) भी हो सकता है.
फिर भी वह जीवट नहीं मरी तो किसी कारण वश पति के न रहने पर वैधव्य सदृश विषैला हत्या. इस तरह की हत्या में पहले से थोड़ा परिवर्तन यह हुआ है की अब सामाजिक हत्यारे उन्हें ‘सती’ होने पर बाध्य नहीं कर पाता है. पर क्या वह शारीरिक रूप से जीवित हो कर अगर वैधव्य की जिंदगी गुजार रही है तो बार-बार उसे मरना नहीं पड़ता है?
यहाँ से भी बच गए तो आज-कल के बच्चे उसे वृद्धाश्रम में रहने को मज़बूर कर पुनः हत्या का प्रयत्न करता हुआ दिखता है.
सबसे बड़ी हत्या भारतीय समाचार-पत्रों की सुर्खियां करती रहती है. बलात्कार के हथियार से हत्या जो चार साल की अबोध बाला से लेकर ७० वर्ष की तपस्विनी सदृश वृद्धा को भी झेलना पड़ता है.
अतः भारत में महिला जब भ्रूण में आती है तब से लेकर वास्तविक रूप में सांस बंद होने तक उसे अनेकों बार हत्या के धारदार तलवारों के नीचे से गुज़रना पड़ता है ,घरेलू हिंसा की शिकार ,खाप -पंचायतों की पाबंदियाँ ,रीति-रिवाज़ और रस्मों का बोझ सब कुछ तो इन्हें ही झेलना पड़ता है .यह प्रचलित उक्ति कि- ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ,ये सब हैं तारण के अधिकारी’ .लेखक ये भूल गए कि उनकी माँ भी नारी थी .जबकि वे उस रामायण कथा का वर्णन करते हैं जिस काल में गार्गी ,मैत्रयी ,कात्यायनी सदृश स्वच्छंद विचारों वाली नारियाँ हुआ करती थीं, तो पूर्व काल में भी लोगों ने नारी को दमन की अधिकारिणी समझा और आज के युग में भी कुछ नारियाँ सशक्त एवं उचाईयों पर आसीन हैं , फिर भी महिलाओं को विज्ञापन और बाज़ारों में ‘वस्तु’ से अधिक नहीं माना जाता है .अतः मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस शताब्दी में भी महिलाओं को जो उचित सम्मान मिलना चाहिए वह सम्मान नहीं दिया जा रहा है .राजनीति में भी जो महिला हैं उन्हें भी अपेक्षित सम्मान कहाँ मिल पाता है .विपक्ष में जो सशक्त हैं उन्हें भी असत्य भाषण कर सदा अपमानित करने का प्रयत्न किया जाता है दूरदर्शन के माध्यम से जो धारावाहिक परोसा जाता है उसमें भी महिलाओं को साजिश करनेवाली षड्यंत्रकारी के रूप में दिखाया जाता है.
हर वर्ष महिला दिवस पर कुछ महिलाओं को सम्मानित कर कर अपना कर्तव्य निर्वाह करने की परंपरा है, पर क्या इससे नारी की हत्या रुक पायेगी? हत्या और वह भी सामाजिक हत्या ! समाज द्वारा हत्या ! इन हत्याओं को अगर वास्तव में रोकना है तो समाज को बदलने की जरूरत है. कठोर कानून की जरूरत है न कि मिथ्या भाषण “बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ’. संकल्प तो यह हो कि ‘जहाँ नारी की पूजा होगी वहीँ देवता रमण करेंगे’ .



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