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अधूरा प्रेम

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अस्पताल में पड़ा हूँ . पता नहीं कैसे आ गया . नर्स और डाक्टर मेरे समीप खड़े हैं. आँखे खोली तो देखा भईया और भाभी खड़े हैं. लेकिन सविता नहीं थी. व्याकुल दृष्टि से चारों ओर देखा लेकिन वो कहीं नहीं दिखी. मैंने घबराकर आँखें बंद कर ली . डाक्टर की हर्षमिश्रित आवाज सुन रहा हूँ की होश में आ गया. भैया डाक्टर को धन्यवाद दे रहे हैं. भतीजी चाचू उठो , उठो न चाचू कह कर उठा रही है. लेकिन मुझे जिस आवाज़ की प्रतीक्षा है वह नहीं सुन पा रहा हूँ. कहाँ है वह, क्या कर रही है, काश एक बार आ जाती . बहुत याद करती होगी मुझे, मैंने दिल से चाहा था उसे. सारे जहाँ की उपेक्षा सहन कर लेता था मात्र उसकी मुस्कराहट में. सविता को बचपन से ही असीम स्नेह करता था. संभवतः पिछले जन्म की चाहत थी मेरी. बचपन में हम दोनों पडोसी थे . साथ में स्कूल जाना, भोजन करना , खेलना और पढ़ना सब साथ होता था. माँ कहती थी कि मैं काकी (सविता की माँ) के हाथ से ही खाना खाता था. छठी क्लास तक साथ रहा दोनों का . अल्प वयस में ही प्यार का बीज अंकुरित हो गया ज्ञात ही नहीं हुआ. सविता को मात्र देख लेने से सारी आकुलता समाप्त हो जाती थी. पता नहीं कौन सी मोह का बंधन था.
इसी बीच मेरे भीतर अजीव परिवर्तन हुआ, महिलाओं के साथ समय व्यतीत करना मुझे अच्छा लगता था. उनकी पोशाकें मुझे आकर्षित करता था. कारण यह भी हो सकता है कि मैं सदा सविता के साथ ही रहता था. कोई भी पर्व हो या मांगलिक कार्य मैं अत्यंत ध्यान से देखता था. हर रीति-रिवाज़ को बारीकियों से अवलोकन करता था.
इसी मध्य विधाता ने क्रूर लीला कर दी. मेरे माता-पिता मात्र एक घंटे के अंतराल में काल के ग्रास बन गए.
हुआ यह कि मेरे गावं के प्रमुख अश्वनी मिश्रा ने असावधानी से अपनी गाड़ी से ठोकर मार दी थी जिसके कारण उन दोनों की मौत हो गयी. “समरथ को न कछु दोष गोसाईं ” चरितार्थ हुई और वे कानून को धोखा देने में सफल हो गए. मेरी जननी जो मेरे ऊपर जान देती थी वह सदा सर्वदा के लिए मुझ से दूर हो चुकी थी. जीविका चलाने वाले पिता के साया से असमय वंचित हो गए. पडोसी ने किसी तरह पालित -पोषित किया. मात्र १६ वर्ष की आयु में मैं अनाथ हो गया. पड़ोस में ताई रहती थी जिनके दया पर मैं जीवित रहा. एक साल तक कैसे जीवित रहा यह पता ही नहीं चला, अध्ययन भी छूट गया. ताई खाना देती तो खा लेता था नहीं तो माँ के स्मृति में विह्वल रहता . ऐसी बात नहीं थी की पिता याद नहीं आते थे लेकिन माँ से उत्कट स्नेह था.
पड़ोस में एक भैया रहते थे, उनकी शादी थी . मुझे वे बलात ले गए. वहां गलत रीति से विवाह होते देख कर मैं ने सब को रीति समझायी, पंडित ने भी अपनी भूल मान ली . कारण था कि बाल्यकाल से ही मैं अत्यंत बारीकि से देखता था . संभवतः यही मेरे जीविका का साधन बनना था. जिनके घर विवाह था उन्होंने मुझे ५० रुपये भी दिए. फिर क्या था जिस किसी के घर कोई मांगलिक कार्य होता था वहां मुझे बुलाया जाने लगा . जीविका के साथ -साथ मुझे जीने का साधन भी मिल गया. आमदनी अच्छी होने लगी .
सविता का अध्ययन सुचारू रूप से चल रहा था . मेरी दोस्ती यथावत थी. समाज में बिना रामा अर्थात मेरे बिना कोई भी मांगलिक कार्य असंभव था. सभी मेरे ऊपर सारा भार डाल कर निश्चिंत रहते थे. गुसलखाने में पानी देने से लेकर हर कार्य में मेरी उपस्थिति अनिवार्य होती थी. रीति-रिवाज़ में महिलाएं अधिक शामिल होती थी अतः स्वाभाविक रूप से महिलाओं का सामीप्य अधिक रहता था. सभी मेरे ऊपर भरोसा करती थीं. वे सब कुछ भी कार्य करती थीं या गोपनीय बातें भी करती थीं तो , यदि मैं अकस्मात वहां पहुँच जाता था तो भी सभी निर्भय हो कर बातें करती ही रहती थी, उन सब का कहना था की अरे अपना रामा ही तो है. इस तरह मैं महिलाओं के संपर्क में रहने लगा. फलतः सबका चहेता बन गया. कभी-कभी अजीब दर्द का अनुभव होता जब मैं पुरुषों के मध्य बैठता तो वे काना -फुंसी करने लगते की रामा यहाँ क्या कर रहा है, इसे तो आँगन में होना चाहिए. मेरा पुरुषत्व जागृत हो उठता . बहस भी हो जाती . लेकिन यह कहावत ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ अर्थात जो दबंग हो , उनकी ही चलती है. यदा कदा पुरुषों की समवेत हंसी से आहत हो जाता था, व्याकुल हो जाता था लेकिन विवश था.
एक विचित्र विवाह में सम्मिलित होने का अवसर मिला . मैं तो इस विवाह में सम्मिलित नहीं होना चाहता था . मेरी अंतरात्मा मुझे धिक्कार रही थी लेकिन पापी पेट का सवाल है इसलिए इस अन्याय में शामिल होना मेरी विवशता थी. विचित्रता यह थी की ४५ साल के वर से १५ साल की कन्या की शादी हो रही थी. इस बेमेल विवाह में बालिका की कितनी दयनीय दशा होगी इस कल्पना से ही मैं काँप गया था. खैर , विवाह आरम्भ हो गया . दूल्हा अजीब था. कन्या निरिक्षण के समय कन्या को इंगित कर इशारे से पहचानना होता है, पर दूल्हे ने पहचानने की जगह उसे गोद में ही उठा लिया. हंसी के फुहारों से महिलाओं के ब्यंग्यपूर्ण हंसी से दूसरे का तो पता नहीं मैं समाज के क्रूर उपहास से व्याकुल हो गया. खैर अजीब हरकतों के मध्य विवाह संपन्न हो गया. बिदाई के समय उस बालिका रूपी दुल्हन का क्रंदन आज तक स्मृति – पटल पर विराजित है. मैंने उस विवाह में एक रुपये भी नहीं लिया. भोजन भी नहीं किया. क्योंकि उस क्रूर पिता के अन्न को ग्रहण करना मेरे लिए पाप था.
अति आकुलता से समय ब्यतीत हो रहा था, किसी की आवाज चौंक गया. पड़ोस के काका मुझे बुला रहे थे. काका नारायणबाबू के पोते का उपनयन संस्कार था. आमंत्रण के साथ सम्पूर्ण जिम्मेवारी सौंप गए. नारायणबाबू का बड़ा बेटा शहर में रहता था और छोटा गावं में . उपनयन दोनों के बेटों का होना था. मैं अपनी सारी व्यथा भूलकर उनके यहाँ के कार्य में लग गया . उपनयन संस्कार को सफल बनाने के लिए. नारायणबाबू गावं के अति विशिष्ट व्यक्ति थे. समाज में उनका बहुत सम्मान था . गावं के वे पहले इंजीनियर थे. उनकी वाणी में अजीब मिठास था. गावं के लिए कुछ भी कभी भी आवश्यकता पड़ने पर खड़े रहतेथे. एक तरह से गावं में जज की तरह उनके राय को माना जाता था. किसी की शादी हो या किसी के घर अन्य कार्य वे तन मन धन से सबकी सहायता करते थे . भाइयों के बीच विवाद चुटकी में सुलझा देते थे. बहुत ख्याति थी उनकी. लेकिन घर की मुर्गी दाल बराबर कहावत अक्षरशः सत्य प्रतीत होता था उनके परिवार के लिए. बड़ा बेटा जो शहर में रहता था वह आर्थिक रूप से कमज़ोर था. इसलिए परिवार के लोग का व्यवहार उपेक्षापूर्ण था. उसकी पत्नी का तो कोई अस्तित्व ही नहीं था. गावं में जो बहु रहती थी उसका ही बोल-बाला था. उसकी सहमति के बिना घर में पत्ता भी नहीं हिलता था. उसका एक मात्र उद्देश्य था अपनी जेठानी को समाज में नीचा दिखाना. जेठानी निशा आर्थिक रूप से कमज़ोर थीं इसलिए चुप ही रहा करती थीं. मैं दो तरह का व्यबहार देख कर क्षुब्द था तथा बचपन में सुन रखा था ” लक्ष्मी बिनु आदर कौन करे , गागर बिनु सागर कौन भरे….” यह कहाबत यहाँ सत्य प्रतीत हो रहा था. और मेरे मन में यह विचार आया ‘जो दीखता वह होता नहीं है’.
उपनयन संस्कार समाप्त हो गया. रोते हुए महादेव भी विदा हो गए और मैं भी अपने घर चला आया यह प्रण कर कि अब कभी नारायणबाबू के किसी भी कार्य में सम्मिलित नहीं होऊंगा . समाज में ऐसी अनहोनी घटनाएँ होती ही रहती है. अनेकों बेटे , बहुएं अर्थ अभाव के कारण . सदा से परिवार में उपेक्षित होते रहे हैं. मैं इस तरह समाज में अनेक कुरीतियों से व्यथित रहता था लेकिन अपनी जीविका के साधन को कैसे त्याग सकता था.
कहते हैं न कि सब कुछ पिछले जन्म का लिखा होता है, सत्य ही है कारण की इस जन्म तो मैं ने कोई भूल नहीं की फिर मुझे ही दंड क्यों मिलता था ? लौट कर घर आया तो देखा की सविता का सामान जा रहा है, पूछने पर पता चला की काका अर्थात सविता के पिता का तबादला हो गया है, इसलिए वे सब गाँव छोड़ कर जा रहें हैं. ईश्वर ने मेरी यह आसरा भी छीन लिया. सविता को जाते देखकर मैं बेबस था. जब तक रिक्शा ओझल नहीं हो गया मैं अश्रुपूरित नयन से देखता रहा. चार-पांच दिन कैसे व्यतीत हो गया पता ही नहीं चला. सुध-बुध खो गया था.
काश जीने का कुछ वज़ह मिलता तो यह दौर भी चला जाता . व्याकुलता में व्यतीत हो रहा था समय , यत्र-तत्र सविता ही दिख रही थी. कभी लगता वह हंस रही है तो कभी मुझे चिढ़ा रही है तो कभी अपनी किताब से शिक्षाप्रद कहानियां सुना रही है तो कभी अपने घर से समोसे ला कर दे रही है.
आरम्भ में सविता का पत्र आता था , फिर धीरे -धीरे पत्र आना भी बंद हो गया. मैं नियमानुसार प्रतिदिन एक पत्र लिखा करता था. पत्रोत्तर आये या न आये मैं अपने नियम को चलाता रहा . समय भी अपने गति से चल रहा था. ‘ समय और ज्वारभाटा किसी की प्रतीक्षा नहीं करती. सविता से बिछुड़े सात साल हो गए. पता चला कि वह मेडिकल कि पढ़ाई कर रही है, अत्यंत प्रसन्नता हुयी . मैं भी अपना भाग्य समझ कर जीवन जीने की कोशिश कर रहा था, संभवतः पिछले जन्म की किसी दुष्कर्म का फल भुगत रहा था.
कुछ दिन पूर्व किसी धनवान ने गावं की सबसे बड़ी हवेली ख़रीदा था , सुनने में आया कि जिसने ख़रीदा है उसकी बेटी का विवाह है. मुझे भी निमंत्रण मिला. तथा विवाह की जिम्मेवारी भी सौंपी गयी. मैं वहां गया तो आंटी(सविता की माँ) को देख कर चकित हो गया. अभिवादन के आदान-प्रदान के पश्चात ज्ञात हुआ कि काका बहुत धनवान हो गए है. सविता का विवाह किसी कडोरपति के घर होना निश्चित हुआ है. लड़का भी डाक्टर है. मेरी तो स्थिति दयनीय हो गयी. किसी तरह अपने आप को संभाला और प्रण लिया कि इस विवाह के बाद किसी भी घरका मांगलिक कार्य नहीं करूँगा. जी -जान से विवाह के हर कार्यक्रम को मैंने सफल बनाने का प्रयत्न किया. सारा उत्तरदायित्व को अपने ऊपर ले लिया . आखिर मेरी सविता की शादी थी .
सविता से मिला . वह मात्र औपचारिकता निभायी . ऐसा प्रतीत होता था मानो मुझे जानती भी नहीं.
हर महिला को अपने जीवन साथी में उसके पुरुषत्व का गुण होना पसंद है. थोड़ा हठधर्मी हो , दृढ संकल्पी , दृढ इच्छाशक्ति वाला , नायक सदृश गुण से पूर्ण , शरीर शौष्ठव से परिपूर्ण व्यक्तित्व वाला व्यक्ति हर स्त्रियों के मन का राजा होता है. वस्तुतः सविता की भी ऐसी ही चाहना थी . रामा में तो स्त्रियोचित गुण ज्यादा था और इन गुणों से उसका कोई नाता नहीं था. विपरीत परिस्थिति के कारण महिलाओं के मध्य रहने से पूर्ण पुरुष होते हुए भी उसमें स्त्रियोचित गुण अधिक परिलक्षित होता था. जब कि वह अंतर्मन से पूर्णतः पुरुष ही था. लेकिन समाज के पास वह दिव्य दृष्टि नहीं थी जो उसके गुण का आकलन कर सके. सविता भी तो सामाजिक प्राणी ही थी , इसलिए रामा से मित्रता तो थी, सहानुभूति भी थी लेकिन प्रेम नहीं था. मित्रता में भी समय के साथ प्रगाढ़ता धूमिल हो गया था. इसलिए वह रामा से औपचारिक सम्बन्ध ही रख पायी. प्यार रामा ने किया था , सपने संजोये थे उसने , पर यह सब रामा के तरफ से था.
मैं आदमी की फितरत से चकित था. यह सोच कर की मेरी सबसे प्रिय सविता की प्रसन्नता इसमें है मैं अति उत्साह से सारे कार्य करता रहा. विवाह संपन्न हो गया . सविता के पति आमोद अति भद्र इंसान प्रतीत हुए. बिदाई के समय तक मुझे ऐसा लगता था कि सविता अवश्य मेरा हाल पूछेगी, लेकिन उसने मेरी फूलों से महकती यादों को भी विस्मृत कर दिया था. जब वो बिदा हो रही थी तो मैं तृषित नयन से विवशतावश जाते हुए देखता रहा.
लेकिन बिदाई काल में अंतिम दृष्टि से रामा को सविता ने देखा तो पिछला वातसल्य प्रेम, करुणा जागृत हो गया, वह आकुल हो गयी . परिवार के सदस्यों से बिछड़ने पर भी जो आभास नहीं हुआ वह दर्द रामा के अंतिम भेंट ने उसमे समाहित कर दिया था और वह फूट-फूट कर बिलख पड़ी. अश्रुपूरित नयन से इस तरह उसे देखा जैसे अंतिम क्षण हो. पति आमोद चुप-चाप उसकी गतिविधि को देख रहा था. धीरे से पूछा- सविता यह तुम्हारा अंतरंग सखा है क्या? सविता रामा से कुछ कह पाती इस से पहले गाड़ी चल पड़ी और वह अपने मन की पीड़ा को अंतःकरण में दफ़न कर अपने नवजीवन आमोदरूपी पथ पर चलने को उद्द्यत हो गयी.
उसके बाद क्या हुआ मुझे ज्ञात नहीं.
अस्पताल में ही आँखे खुली, होश में हूँ, सब समझ रहा हूँ , पड़ोस के भइया ने मेरी आँखों से आंसू पोंछे और कह रहे थे – बेचारे का जन्म दूसरे के लिए ही हुआ था. डाक्टर कह रहा था – कोमा में चला गया है, कब तक स्वस्थ होगा कह नहीं सकता. भाभी कह रही थी- डाक्टर साहब, किसी तरह इन्हें बचा लीजिये, भतीजी – उठो चाचू उठो कह कर उठा रही थीं और मैं विवश लाचार पड़ा हूँ इस आश में की सविता आ कर गले लग जाये और मेरा हाल पूछे. जीने की थोड़ी भी इच्छा नहीं है, ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ – हे ईश्वर मेरा जन्म पुनः इस धरा पर न हो , यदि हो तो स्वार्थी लोगों से दूर रखना .
कहीं कभी गुलज़ार की लिखी पंक्तिया मुझे याद आने लगा -
‘मैं सजदे से उठा तो
कोई भी न था
वो पाँव के निशान साथ ले गया
गया तो मेरी जान साथ ले गया
वो मेरे दो जहान साथ ले गया
तमाम दास्तान साथ ले गया…… .



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
January 2, 2016

आदरणीया रजनी दुर्गेश जी ! सादर अभिनन्दन ! एक अच्छी कहानी पढ़ने को मिली ! वास्तविक जीवन ऐसा ही दुखद है ! सादर आभार ! नववर्ष की बधाई !


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