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सामायिक 'मित्रता और शत्रुता'

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मित्रता या शत्रुता दोनों ही सम्बन्ध आज अस्थायी हो गई है. न मित्र स्थायी हैं न शत्रु. कोई एक भी स्थायी होता तो हमें ‘स्थायी’ शब्द पर विश्वास हो जाता. वास्तव में दोनों में से कोई भी ऐसा नहीं होता जिसपर हम विश्वास कर पाते. विश्वास के मामले में दोस्त से अधिक विश्वासी संभवतः शत्रु हो सकता है , लेकिन राजनैतिक परिपेक्ष्य में यह भी उचित नहीं है. ऊंट कब किस करवट पलटेगा कोई नहीं जान सकता है. वैसे ही मित्र कब शत्रु और शत्रु कब मित्र बन जाये कोई नहीं जनता. वैसे दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है और राजनीति में कुछ ज्यादा ही होता है. लेकिन ‘दोस्त का दोस्त दुश्मन होता है’ यह मुहाबरा भले ही नहीं बना हो लेकिन राजनीति के संसार में यह मुहाबरा जैसे ही सही है.
अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कब कट्टर शत्रु कब मित्र बन जाते हैं यह कहना कठिन हैं .आम जनता से राजनीतिज्ञ तक में यह बात देखने को मिलती है.जनता जब अपने पसंद के नेता का चयन करके देश की वागडोर सँभालने को देती है तो वही नेता अपने निज-स्वार्थ के लिए विरोधियों को गले लगा लेते है ,इसे देख जनता भ्रमित हो जाती है . जनता अपने नेता के कारण प्रतिपक्षी नेता से शत्रुता मोल लेता है पर नेताओं को उनसे गले मिलते देखकर ठगा सा अनुभव करता है .यथा -बी.जे.पी. और जीतन राम मांझी ,दोनों विरोधी थे. मांझीजी विरोध में कितना बोलते थे वही अब मित्र बन गए ,एक मञ्च पर एक दूसरे को मिठाई खिलाते देखे जाते हैं . जब मांझीजी नीतीशजी के नहीं हो पाये तो बी . जे .पी . के क्या होंगे ? यही मित्रता कब शत्रुता में परिवर्तित हो जायेगा कहना कठिन है . पासवानजी ही पहले बी .जे .पी के विरोधी थे. एक दूसरे पर आरोप मढ़ते थे वही अब मित्र बन गए है , जिसके साथ गठबंधन था या मित्रता थी, उसी के विरोध में बोलते है , मात्र स्वार्थ पूर्ति के लिए ही तो, जनता यह देखकर विस्मित है . लालूजी नितीशजी और कांग्रेस की स्थिति भी यही है कल तक के विरोधी आज मित्र बन गए है, आलोचक समर्थक बन गए है .इसे क्या कहा जायेगा ?, कुर्सी के प्रति मोह ही तो.
एन. सी .पी . समाजवादी और पप्पू यादव का गठबंधन को देखकर जनता चकित ही तो है . यह पद का मोह ही तो है .कुर्सी के लिए कुछ भी कर सकते हैं . तात्पर्य यह कि सब एक ही है , मात्र जनता से वोट प्राप्त करने के लिए अलग अलग दिखने का ढोंग करते हैं . एक दूसरे की आलोचना करते हैं, अपशब्द तक बोलते हैं लेकिन हैं सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे .
जनता को भ्रमित करना बड़े बड़े वायदे करना , जनता को आत्मीय हैं यह दिखाना ,लेकिन करना वही जिससे उन्हें लाभ हो .कुछ काम दिखाने के लिए करना ,कुछ कागज पर दिखाना ,जिससे जनता पुनः ५ साल बाद चयन करे .यदि देश में काम होता तो इतनी बेरोजगारी नहीं होती ,किसान आत्महत्या नहीं करते ,बाल श्रमिक का शोषण नहीं होता ,बेटियाँ दहेज़ की बलि वेदी पर होम नहीं होती ,मासूम बच्चियाँ या निर्दोष महिलाएँ हवस का शिकार नहीं होती ,आरक्षण रुपी महामारी में मासूम की मौत नहीं होती ,निजी संस्थाओं में हमारे अपनों का शोषण नहीं होता ,बुजुर्ग अपमानित नहीं होते ,गरीबी के कारण बच्चे कुपोषण के शिकार नहीं होते ,मदिरापान से देश के नौजवान भ्रमित नहीं होते ,किशोर मार्ग से भटकते नहीं ,शिक्षा के अभाव में अधिकांश जनता अशिक्षित नहीं रह जाते, जाति भेद नहीं होता और भी अनेकों समस्याओं से पीड़ित नहीं रहता समाज .
पहले तो जनता को बाँटते थे या वोट के कारण ठगते थे लेकिन अब तो महापुरुषों को बाँट रहे हैं ,महान क्रांतिकारियों को विभक्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं .देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले को बाँट रहे हैं ,देश के लिए स्वयं को समर्पित होनेवाले पर दोषारोपण उचित नहीं हैं ,होम करते भी हाथ जलता है ,हो सकता है कुछ त्रुटि रह गयी हो ,उसके लिए मरणोपरांत कलंकित करना अन्याय है .कोई भी हो, सभी महापुरुष पूजनीय हैं , जिनकी संतान अभी हैं मात्र उसे नीचा दिखाने के लिए या अपमानित करने के लिए ऐसा करना न्याय नहीं हैं .कोई भी महापुरुष चाहे वे युगपुरुष गांधीजी हों या लौह पुरुष पटेल हों या कर्णधार सुभाष चन्द्र बोस हों या चाचा नेहरू हों या अन्य देवतुल्य महापुरुष . ये सबके हैं. संपूर्ण देश परिवार हैं उन सबका. संपूर्ण देश ऋणी है ,किसी पर दोष लगाना अपने परिवार के पूर्वजों पर आरोप लगाने की तरह होगा. जब स्वयं की पुत्री कह रही है तो अन्य की क्या बात .कुछ लोग तो अपने नाम के लिए भी ऐसे ही आरोप मढ़ते है .चार साल कुछ काम नहीं की, अब ऐसा शगूफा निकालें जिससे जनता भ्रमित होकर पुनः वोट दे . अस्तु यह मेरी दृष्टि है l
बात यह हैं कि ये फ्रैंडली मैच खेलते हैं ,जिसतरह हम विद्यालयों में खेला करते थे . एक दिन ‘तुम ,तुम, तुम’ मेरे टीम में ‘वो, वो, वो’ तुम्हारे टीम में . दूसरे दिन ‘तुम और वो’ मेरे टीम में , और ‘वो,तुम और तुम दूसरे टीम में इस तरह खेल के समय हम सब मज़ा लेते थे. एक दूसरे को पछाड़ने के लिए हराने के लिए . खेल समाप्त होने के पश्चात् ‘वो’ और ‘तुम’ सब बराबर हो जाते हैं,सब आनंदित रहते थे .
पैरों तले मात्र घास कुचला जाता था . राजनीति का खेल भी कुछ इसी तरह चल रहा है,जो जमीन से घास की तरह जुड़े हुए हैं वे राजनीतिज्ञों के पैरों के तले कुचले जा रहे हैं.



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
October 9, 2015

सही कहा है आपने । भारतीय राजनीति में तो कब मित्र शत्रु बन जाएं और कब शत्रु मित्र, कुछ कहा नहीं जा सकता । सब तात्कालिक स्वार्थ पर आधारित होता है । मूर्ख बनती है तो केवल भोली-भाली जनता ।


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