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आरक्षण एक साजिश

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आज देश प्रगति और विकास के चरम शिखर पर है. सफलता की सोपान पर विराजमान है. हमारा देश सम्पूर्ण विश्व में सफलता की परचम लहरा रही है. विजयपताका की गूंज से गुंजायमान होती है, लेकिन विकास के अनेक चरण को पर कर लेने के पश्चात भी देश को समस्याओं का देश कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. विविध समस्याओं से ग्रसित होने के कारण नित्य नविन समस्याओं से जूझ रहा है. कभी कुछ समस्या तो कभी कुछ. यदा-कदा आरक्षण रूपी महामारी से देश की जनता जूझती रही है. कभी आरक्षण पिछड़ी जाति को देने केलिए तो कभी प्रमोशन के लिए तो कभी अन्य जातियां अपनेको आरक्षण के श्रेणी में अपने को घोषित/ नामित करवाने केलिए समस्या उठाते रहते है और देश इनसे जूझता रहता है. यह समस्या भारत में विस्फोटक के रूप में उभरता रहता है. आज कल पुनः गुजरात में पटेल समुदाय, बिहार में निषाद , हरयाणा में जाट,गुज्जर आदि सभी आरक्षण के मांग को लेकर देश के आगे समस्या उत्पन्न किये हुए है.
आरक्षण का मूल अर्थ है “सुरक्षित रखना”. समाज के पिछड़े वर्गों को निम्न जातियों के लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने का प्रयत्न करना ही आरक्षण होना चाहिए. समाज में लोग सामाजिक ,आर्थिक या किसी भी दृष्टि से पिछड़े हुए हैं,अपने को असुरक्षित मानते है , उनकी रक्षा के लिए प्रावधान हुआ था आरक्षण का. सरकारी तौर पर आर्थिक सुरक्षा और नौकरी आदि की गारंटी स्वयं सरकार ही दे सकती है. इसलिए संविधान में पिछड़े वर्गों के हित के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी.
विंध्य के दक्षिण में प्रेसीडेंसी क्षेत्रों और रियासतों के एक बड़े क्षेत्र में पिछड़े वर्गो (बीसी) के लिए आजादी से बहुत पहले आरक्षण की शुरुआत हुई थी। महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्ग से गरीबी दूर करने और राज्य प्रशासन में उन्हें उनकी हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षण का प्रारम्भ किया था। कोल्हापुर राज्य में पिछड़े वर्गों/समुदायों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिए 1902 की अधिसूचना जारी की गयी थी। यह अधिसूचना भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाला पहला सरकारी आदेश है। लेकिन आज तक आरक्षण से अगर किसीका या किसी समुदाय का विकास न हो सका तो फिर आरक्षण का औचित्य पर प्रश्न स्वाभाविक है.
आरक्षण के सम्बन्ध में निम्न बातें विचारणीय है:
जाति आधारित आरक्षण संविधान द्वारा परिकल्पित सामाजिक विचार के एक कारक के रूप में समाज में जाति की भावना को कमजोर करने के बजाय उसे बनाये रखता है। आरक्षण संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति का एक साधन है।
कोटा आवंटन भेदभाव का एक रूप है, जो कि समानता के अधिकार के विपरीत है।
आरक्षण ने चुनावों को जातियों को एक-दूसरे के खिलाफ बदला लेने के गर्त में डाल दिया है और इसने भारतीय समाज को विखंडित कर रखा है। चुनाव जीतने में अपने लिए लाभप्रद देखते हुए समूहों को आरक्षण देना और दंगे की धमकी देना भ्रष्टाचार है और यह राजनीतिक संकल्प की कमी है। यह आरक्षण के पक्ष में कोई तर्क नहीं है।
आरक्षण की नीति एक व्यापक सामाजिक या राजनीतिक परीक्षण का विषय कभी नहीं रही. अन्य समूहों को आरक्षण देने से पहले, पूरी नीति की ठीक से जांच करने की जरूरत है और लगभग 60 वर्षों में इसके लाभ का अनुमान लगाया जाना जरूरी है।
शहरी संस्थानों में आरक्षण नहीं, बल्कि भारत का 60% जो कि ग्रामीण है उसे स्कूलों, स्वास्थ्य सेवा और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है।
“अगड़ी जातियों” के गरीब लोगों को पिछड़ी जाति के अमीर लोगों से अधिक कोई भी सामाजिक या आर्थिक सुविधा प्राप्त नहीं है। वास्तव में परंपरागत रूप से ब्राह्मण गरीब हुआ करते हैं।

सरकार की इस नीति के कारण पहले से ही प्रतिभा पलायन में वृद्धि हुई है और आगे यह और अधिक बढ़ सकती है।
आधुनिक भारतीय शहरों में व्यापारों के सबसे अधिक अवसर उन लोगों के पास हैं जो ऊंची जातियों के नहीं हैं। किसी शहर में उच्च जाति का होने का कोई फायदा नहीं है।
आज कल सुरक्षा का वास्तविक अर्थ आर्थिक सुरक्षा ही है. अतः आर्थिक विकास का प्रयत्न करना आरक्षण- व्यवस्था का मानवीय दृष्टि से अत्यंत उपयुक्त कदम होगा. निंदनीय कदम तब होता है जब इसे देने का आधार केवल आर्थिक पिछड़ापन न रहने देकर, उसके साथ किसी या किन्ही जातियों को भी जोड़ दिया जाता है. अतः जाति-आधारित आरक्षण नीति अपनाने या उसकी घोषणा करने का सबसे अशोभनीय दुखद परिणाम यह निकला है कि जाति प्रथा का बहुत जो लोग विस्मृत कर गए थे उसे पुनः जागृत कर दिया . कुछ अवसरवादी नेताओं ने. पुनः जाति प्रथा छुआ-छूत की समस्या खडी कर दी है. यह आरक्षण का घृणित पक्ष है.
कितने नेता पिछड़ी जाति के होते हुए भी साधन संपन्न थे या है , ऐसे लाखों -करोड़ों मानव पिछड़ी जाति के होते हुए भी अन्य जाति वालों से सवर्णों से समृद्ध और संपन्न जीवन जी रहे हैं. हज़ारों सरकारी अफसर आर्थिक दृष्टि से उन्नत हैं. अब यदि जाति के आधार पर आरक्षण दिया जाता है, तो इस प्रकार के लोग लाभान्वित होते है और जिसे आवश्यकता है वे वंचित रह जाते हैं. वास्तव में आरक्षण पिछड़ों को सदा पिछड़ेपन के एहसास से जोड़े रहता है , अपनेको दूसरों से हीन मानते रहने की एक तरह से बाध्यता हो जाती है. पराधीनों को पराधीन और परावलम्बी बनाये रखने की साजिश है. आरक्षण का लाभ तो सशक्त जातियों के हिस्से में जा रही है. परिणामस्वरूप आरक्षण की नीति के बावजूद बहुत सी जातियों का सामाजिक-आर्थिक स्तर पर पिछड़ापन कायम है. कई स्तरों पर यह मांग उठना स्वाभाविक है कि आरक्षण का लाभ उन्हें ही मिले जो आर्थिक रूप से पिछड़े हों. नियमतः यह उचित ही है . आरक्षण का आधार अगर आर्थिक हो न कि सामाजिक एवं जातीय हो तो शायद यह समयसान्दर्भिक एवं समीचीन होगा.
सबसे दयनीय अवस्था विद्यालय महाविद्यालयों या अन्य शिक्षण संस्थानों में होती है आरक्षित सीटों के कारण प्रवेश तो मिल जाती है, कम अंकों में भी नामांकन तो हो जाता है ,लेकिन वे मेधावी विद्यार्थियों से पीछे रह जाते हैं .ऐसे छात्र हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं ,मनोरोगी तक हो जाते हैं इससे लाभ के बदले हानि ही होती है .आरक्षण की नहीं आत्मविश्वास की आवश्यकता है .समस्त वर्ग को आर्थिक दृष्टि से निम्न या कमतर को इसकी सुविधा देनी चाहिए .समस्त पिछड़े वर्ग को आरक्षण की नहीं प्रतिभा जागरित करने की तथा आत्मविश्वास बढ़ाने की आवश्यकता है जिससे दब्बू या मनोरोगी नहीं स्वाभिमानी बनेंगे .नेता वोट बैंक क़े लिए आरक्षण को एक पिटारा क़े रूप में उपयोग करते हैं .सर्वजन हितार्थ आरक्षण का उपयोग होना चाहिए .
मेरी दृष्टि में आरक्षण को पूर्णरूपेण समूल नष्ट कर देना चाहिए . अम्बेडकर साहब जब प्रावधान किये थे तो पिछड़े वर्ग की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी ,लेकिन आज की स्थिति तो परिवर्तित हो गयी है .
मानवतावादी युग है, राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय जातीबाद की बात करना हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और बुद्धिबाद के ओछेपन या निम्न कद होने का प्रतीक है. जब तक आप किसी को अंगुली पकड़ कर चलाते रहेंगे और वह आश्वस्त रहेगा की यह अंगुली मुझे तो मिला ही है और मेरे आनेवाली पीढ़ियों को अनंत काल तक मिलता रहेगा तब तक वह और उसकी आनेवाली पीढ़ी शायद खुद अपने भरोसे चलना नहीं सीख सकता . बहुत दिनों तक अंगुली पकड़कर चला दिया , अब तो अपने भरोसे चलने दिया जाय .
हाँ , अगर राजनीति चलाने हेतु शासकवर्ग जैसे पहले के ज़माने में जनता को शिक्षा से वंचित रखते थे और फुट डालो शासन /दमन करते थे , ठीक उसी तरह जनताओं को जात-पात,उंच-नीच,अनुसूचित जाति,जनजाति,पिछड़ा,अगड़ा इत्यादि विभिन्न वर्गों में बाँट कर फूट डाल कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं तो जनता कब तक सहन करेगी ?
अतः आरक्षण नाम के इस भूत को समूल नष्ट करके समाज को एक नया आयाम देना अत्यावश्यक है.
मेरी दृष्टि में सर्वजन हितार्थ यह कदम उपयुक्त है.



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
October 9, 2015

आपके विचार पूरी तरह से सही हैं । लेकिन वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था जो वोटों के खेल पर आधारित है, अब इस नासूर को शल्य-क्रिया द्वारा समाप्त करने में सदा बाधक ही रहेगी । यह दोषपूर्ण नीति जो पूर्णतः समाज एवं देश के लिए हानिकारक है, अब संभवतः समाप्त नहीं की जा सकती । यद्यपि यह कहा जाता है कि संसार में असंभव कुछ भी नहीं है, भारत से आरक्षण की नीति का समाप्त हो पाना तो असंभव ही लगता है ।

sadguruji के द्वारा
September 8, 2015

आदरणीया रजनी दुर्गेश जी ! सादर अभिनन्दन ! सार्थक और विचारणीय लेख के लिए बधाई ! आरक्षण हटाने का सुझाव अच्छा है, परन्तु अब ये संभव नहीं है ! देश में आरक्षण हटाते ही एक महाभारत शुरू हो जाएगी ! दलित वोट बैंक को नाराज न करने की भी मज़बूरी है ! अच्छी प्रस्तुति के लिए सादर आभार !

Shobha के द्वारा
September 8, 2015

प्रिय रजनी जी पहले लेखों की तरह ज्ञान वर्धक लेख लेख का सार हाँ , अगर राजनीति चलाने हेतु शासकवर्ग जैसे पहले के ज़माने में जनता को शिक्षा से वंचित रखते थे और फुट डालो शासन /दमन करते थे , ठीक उसी तरह जनताओं को जात-पात,उंच-नीच,अनुसूचित जाति,जनजाति,पिछड़ा,अगड़ा इत्यादि विभिन्न वर्गों में बाँट कर फूट डाल कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं तो जनता कब तक सहन करेगी ?आरक्षण समाज को पीछे ले जा रहा है


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