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क्या हम स्वतंत्र हैं ?

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माननीय राष्ट्रपति कहते है अखाड़े में बदल गया है संसद . सच है . हमारे सांसद ४० हो या ४०० हो सब मिलकर हमारे साथ अन्याय करने पर तुले हुए हैं. एक दूसरे पर आरोप लगाते रहते है और अपनी बात मनवाने केलिए सरकारी खजाने का अपव्यय होता रहता है.
आज हम स्वतंत्र हैं , हमारा अपना अस्तित्व है. अपना ध्वज है. अपना संविधान है. हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं. हमारे स्वतंत्रता के दीवानों द्वारा किये गए अथक परिश्रम को स्मरण करने , उनके साहस त्याग, तपस्या और बलिदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने देश की अखंडता को बनाये रखने के लिए यह पावन दिवस प्रतिवर्ष प्रतिज्ञा लेने का अवसर प्रदान करता है. यह अवसर हम सब देशवासियों का देश के राजनितिक, सामाजिक,आर्थिक,वैज्ञानिक एवं धार्मिक स्वरुप का विश्लेषण कर के उनमें जो कुछ सड़ा- गला रूढ़िग्रस्त है उसे मुक्त करने का अवसर प्रदान करता है.
हमारा देश भारत कितनी शताब्दियों तक पराधीन रहा है. पहले मुगलों का गुलाम रहा उसके बाद अंग्रेजों ने अपने अधीन कर लिया. अपने देश को लाभ पहुँचाने केलिए अंग्रज़ों ने बड़ा शोषण किया . भारत में व्यापार करने आये थे और भारतीय राजाओं-महाराजाओं की आपसी कलह का लाभ उठाकर धीरे -धीरे शासक बन गए. शासक बन कर भारत को हर तरह से कमज़ोर बनाने की चेष्टा की. लेकिन भारतीय जनताओं ने सदैव विरोध किया . पलासी के युद्ध के पश्चात हर वर्ष भारतीय विरोध करते ही रहे. १८५७ ई. में देश को गुलामी के ज़ंज़ीर से मुक्त करने के लिए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया. देश के कोने-कोने में विद्रोह का विगुल बज गया. आंदोलन आरम्भ हुआ . ब्रिटिश सरकार के दमनकारी नीति के कारण हज़ारों भारत वासियों को गोली खानी पड़ी , लाठियां सहन करनी पड़ी. काल कोठरी में अमानुषिक यातनाएं झेलनी पड़ी. महान सपूतों को कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता . देश के लिए हँसते-हँसते बलिदान देने वाले असंख्य सपूतों में खुदीराम बोस, भगत सिंह आदि अनेकों ने देशप्रेम में फांसी पर झूल गए. अपने नन्हे पुत्र को पीठ पर बांध कर झाँसी की रानी फिरंगियों से अनवरत लोहा लेती रहीं, अपने मातृभूमि की स्वतंत्रता के केलिए. अंततोगत्वा गांधीजी, नेहरूजी,बल्लभ भाई पटेलजी आदि नेताओं ने देश को गुलामी की ज़ंज़ीर से मुक्त करा ही दिया. प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सभी वीर सपूतों को हमारा सलाम.
अब प्रश्न उठता है कि क्या ये सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी बलिदान जिस उद्देश्य से दिया था वह हम हासिल कर पाये ? परतंत्र भारत में जो शोषण एवं लूट था उसमें बहुत ज्यादा बदलाव हम जनता महसूस कर पा रहे हैं ? आर्थिक विषमता बढ़ता चला गया या कम हुआ है ? ६७ वर्षों के बाद भी हमारे नेता लोग जातिगत राजनीति करते हैं, सरकार जातिगत जनगणना कराती है. मंदिर-मस्जिद नेताओं का मुद्दा होता है. अशिक्षा से देश जूझ रहा है. आरक्षण के वजह से टैलेंट की अवहेलना हो रही है. भ्र्ष्टाचार चरम पर होने से जनता अप्रत्यक्ष ‘कर (टैक्स)’ अदा करने को मज़बूर है. महंगे कानून और दाव-पेंच(वकीलों द्वारा) भरा कानून के कारण से बाहुबली और रसूख वाले लोग अपराध करने के बाद भी सजा से बचे रह जाते है. सभी भ्रष्टाचारी नेताओं , अधिकारीयों आदि को सजा नहीं मिल पाता है. घोटाला करने के बाद न्याय प्रक्रिया में ( वजह जो भी हो) देर होता है या जान बूझ कर देर करवाया जाता है और अपराधी स्वतंत्र रहते है. परिवार का एक सदस्य अपराध करता है और बांकी सदस्य उसी अपराध से अर्जित अर्थ से आनंद पूर्ण जीवन व्यतीत करता है. देश में व्यापारियों को छूट है जनता को लूटने की. आवश्यक उत्पाद पर एम आर पी इतना ज्यादा लिखा होता है की एम आर पी पर खुदरा व्यापारी सामान बेचकर मुनाफाखोरी कर पाता है. खाने -पीने की वस्तुओं के मूल्य (रेट) पर सरकार कोई लगाम नहीं लगाती. सरकार जनता को आवश्यक रोटी ,कपडा और मकान उपलब्ध नहीं करा पा रहा है. सभी को अभीतक शिक्षा का अधिकार नहीं मिल पाया है. शिक्षा प्रदान करवाना व्यापर हो गया है. सरकार वहां भी कुछ नहीं कर रहा है. अच्छी शिक्षा महंगी है और मनमाना फ़ीस वसूला जाता है. बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि , बलात्कारियों में वृद्धि हुयी है और हर दिन समाचारों का अधिकांश अंश बलात्कार की घटनाओं से भरा पड़ा रहता है. चोरी,डकैती, ठगी, गवन, बलात्कार, एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग का शोषण, सरकारी धन का चुने हुए नेता लोगों और अधिकारीयों द्वारा दुरूपयोग, रसूखदारों एवं बाहुबलियों द्वारा कमज़ोर ( शारीरिक एवं आर्थिक) वर्ग पर शासन एवं शोषण तब भी होता था और आज भी हो रहा है. तो इस परिस्थिति में हम अपने को स्वतंत्र कैसे महसूस कर पाएंगे ?
स्वतंत्रता क्या कुछ लोगों को ही मिलना था और जबरन बांकि समाज को समझाना पर रहा है कि भाई हम स्वतंत्र हो गए हैं. और तो और जो लोग पढ़े लिखे हैं और व्यावसायिक शिक्षा के बदौलत गाढ़ी कमाई भी कर रहें हैं , उनलोगों से जब टी. वी. के पत्रकार पूछते हैं कि १५ अगस्त क्या है और आपके लिए इसका मतलब क्या है तो वे जवाब देते हैं की – यह उनके लिए एक और अवकास है, कुछ तो यह भी कहते देखे गए हैं कि यह गणतंत्र दिवस है !? ऐसा क्यों है ? क्योंकि आज भी वे अपने को शायद स्वतंत्र नहीं समझ पा रहे हैं या उन्हें स्वतंत्रता का अर्थ ज्ञात नहीं है . बस झंडा फहराने का दिन , प्रधान मंत्री का लाल क़िले से भाषण देने का दिन और अवकास का दिन होने से फिल्म देखने का दिन !?

इस महान पर्व के कुछ दिन पूर्व सभी देशवासी संसद में सांसदों को देख कर क्षुब्ध हैं. संसद में इन नेताओं की करतूत को देखकर व्यथित हैं .ऐसा प्रतीत होता है जैसे बच्चों की टोली झगड़ रहे हों . देखकर ऐसा अनुभव होता था जैसे ये आयु में तो बड़े हो गए है लेकिन आचरण से या मानसिक रूप से अविकसित ही हों . करोड़ों रुपये स्वाहा हो गए लेकिन इसका किसी को कोई गम नहीं , मात्र एक दूसरे पर लांछन लगाना ही प्रमुख कार्य है . यह भी नहीं सोचते कि किस पर दोष लगा रहे हैं ,सत्य है भी कि नहीं . जिस पर आरोप लगा रहे हैं वह मानव जीवित है भी कि नहीं . मरणोपरान्त यदि प्रशंसा नहीं कर सकते तो निन्दा भी नहीं करनी चाहिए . कितनी पीड़ा होती होगी उसके परिवारवालों को ,उनके जख्म हरे हो गए होंगे , क्योंकि असमय खोया है अपनों को . छोटी छोटी बातों पर लड़ते है ये सब .देश की कोई चिंता नहीं . करोड़ों रुपये गरीबों में बाँट देते तो दो जून की रोटी के लिए उनसबको तरसना तो नहीं पड़ता . भारतमाता भी सोचती होंगी कि इन्हीं दिनों के लिए हम आज़ाद हुए, हमारे सपूतों ने क़ुरबानी दी . ६७ वर्ष हो गए. क्या पूर्णरूपेण आज़ाद हो पाये हैं ? खुली हवा में साँस ले पा रहे हैं ? पहले फिरंगियों द्वारा प्रताड़ित होते थे आज भी प्रताड़ित हो ही रहे हैं ,प्रतिदिन बेटियों की लाज खण्डित होती हैं ,तिल तिल कर मर रही हैं .क्या ऐसे में मन आनन्दित हो पायेगा ?
क्या हम स्वतंत्र हो गए? क्या हमें स्वतंत्रता मिला ? या केवल शासक बदल गए ? स्वराज तो सही अर्थ में नहीं मिला न ?
भ्रष्टाचारियों से मुक्ति, भेद भाव रहित समाज, सभी को भोजन की व्यवस्था , शिक्षा, गृह आदि की व्यवस्था एवं अपराधियों को शीघ्र एवं सख्त सजा, विकास की बातों पर सहमति, सरकारी खजानो का सदुपयोग,शोषण मुक्त समाज, जमाखोरों और मुनाफाखोरों से मुक्ति, आतंकियों के मन में भय, पडोसी देशों के साथ बराबरी एवं सौहाद्रपूर्ण सम्बन्ध , ऊँच-नीच विहीन समाज, सभी के लिए शिक्षा का प्रबंध, ये सब मिले तब तो स्वतंत्रता, नहीं तो हम अपने को स्वतंत्र कैसे समझें ?



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1 प्रतिक्रिया

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Shobha के द्वारा
August 20, 2015

प्रिय रजनी बहुत अच्छा लेख रजनी जिन देशों में तानाशाही उन देशों के नागरिकों की जुबान मुंह में ही घूमती रहती है भारत में हम जो चाहे बोल सकते हैं ४० सांसद ४०० पर भारी थे बस यही स्वतंत्रता है इसकी हम भारी कीमत चुकाते हैं हर बार की तरह बहुत अच्छा लेख सोचने पर मजबूर करता लेख परन्तु मुझे तुलना के लिए मजबूर करता लेख


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