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अजीब प्रेम (उपवन -१०)

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शरतचन्द्र की किसी गल्प में पढ़ा था – मुख्य पुरुष पात्र अपने प्रेमिका के सम्बन्ध में कहता है कि ” पिचकी हुई नाक,छोटी-छोटी ऑंखें और सांवली लड़की ही मुझे अच्छी लगती है तो मैं क्या करूँ?”
सच है , जीवन में कब कौन और कैसे पसंद आ जाये यह कहना कठिन है .किस पड़ाव पर कौन अपना सा लगने लगे और कब कौन अपना बन जाये यह कहना असंभव है. मानव किसके लिए कब अपना सर्वस्व किसी को समर्पित कर दे यह भी कहना अति कठिन है .
आज मैं आप सबके समक्ष कुछ ऐसी ही इस से मिलती – जुलती एक मार्मिक कथा आप सबको बताना चाहती हूँ .
कहा जाता है आज का मानव हृदयहीन हो गया है . उसके अंदर कोमलता नहीं है, वह माता पिता की आज्ञा नहीं मानता , सम्मान नहीं करता . महिलाएं हृदयहीन हो गयी हैं , अन्तर्रात्मा मर चुकी है , वे मात्र धनलोलुप हो गयी हैं , संवेदनशील नहीं हैं आदि आदि . ये पूर्णतया सत्य नहीं है . हर युग में हर तरह के मानव हुए हैं , और होते रहेंगे . परापूर्व काल से ही हर तरह के मानव हुए हैं ,यदि सभी सच्चे होते तो रावण ,कंस ,मन्थरा, कैकेयी आदि से हम अवगत नहीं होते . अर्थात हर युग में हर तरह के मानव होते है और होते रहेंगे . जब देवता हर तरह के तो मानव कैसे नहीं हों ?
आप सब सोच रहे होंगे कि प्रवचन क्यों ? बात यह है कि उपवन श्रृंखला को भूलकर अपने ताने बाने में उलझ गयी थी. ताना-बाना क्या मकड़जाल में उलझ गयी थी . सांसारिक एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों को सँभालते -संभालते स्मरण व विस्मरण का अनवरत सिलसिला मानवोचित ही है शायद !
आज मेरी उत्कट उत्कण्ठा हुई कि यह कथा आप सबको सुनाऊँ .यह घटना उपवन से ही संकलित है . मैं एक दिन सायंकाल सैर करने के लिए घर से निकली ….समीप ही एक उद्यान में बरबस ही खींचीं सी चली गयी . उपवन अत्यंत मनमोहक था , मध्यम-मध्यम लहरें, शायद झील में चल रही नौकाओं या किसी जल-पक्षियों के कारण उत्पन्न हो रही थी उससे वातावरण और भी मोहक बन रहा था . चारों ओर हरियाली ही हरियाली ,करीने से सुसज्जित अशोक वृक्ष की कतारें, दृश्य को अति रमणीय बना रहा था ,पीले पीले कनेर के पुष्प ,झील के भीतर कमल के फूल दृश्य को चित्ताकर्षक बना रहा था .पंक्तिबद्ध सफेद हंसो का मधुर कलरव से ऐसा परिलक्षित हो रहा था मानो गन्धर्व अपने अपने वाद्य यंत्र ले धरा पर अवतरित होकर जुगलबंदी में संलग्न हों .
मैं विमुग्ध थी मनोहारी, मनमोहक एवं मनोरम दृश्य के अवलोकन में. अकस्मात् मेरी दृष्टि उपवन से थोड़ी दूर एक झोपड़ीनुमा घर पर गया . संयोगवश मेरा ध्यान उस वाटिका के बाहर एक झोपड़ीनुमा घर पर गया ओर मैं अनजाने ,पता नहीं क्यों सम्मोहित सी उधर चली गयी . जब समीप पहुँची तो प्रथम दृष्टि में किसी का पैर दिखा . मैं अपने आपको रोक नहीं पायी और वहाँ चली गयी तो देखा एक मानव बेसुध सा लेटा था जमीन पर . मैं उसकी दयनीय दशा देखकर उद्विग्न हो गयी थी और विचार ही कर रही थी कि यह मनुष्य कौन हो सकता है ? बेसुध क्यों है ? स्वयं ही सुध बुध खोकर इसी चिंतन में तल्लीन थी कि एक कोकिल कंठा की मीठी आवाज़ सुनकर पीछे पलटकर देखा तो एक सांवली सलोनी लड़की को खड़ी पायी , जो मुझे आवाज़ दे रही थी. मैंने उसे देखा तो उसने अभिवादन किया और पूछा कि आप समीर को देख रही हो दीदी ! मैनें स्वीकृति में सर हिला दिया ,नाम तो जान गयी पर अधिक जानने की उत्सुकता में पूछ बैठी कि यह मानव कौन है ? ये निर्जीव सा क्यों पड़ा है ? और तुम्हारा नाम क्या है ? तुम कौन हो ? उसने कहा भवाना नाम है मेरा . समीर हैं ये , बहुत भले इन्सान थे ,बहुत ही बड़े आदमी थे .बहुत ही धनवान थे .बहुत बड़ी हवेली थी ,चार पाँच गाड़ियां थीं . दौलत और सोहरत सभी कुछ था उनके पास . परोपकारी भी बहुत थे . सबकी सहायता करते थे . इतना कहकर चुप हो गयी .
जिज्ञासावश मैंने पूछा फिर क्या हुआ ? वे इस अवस्था में कैसे पहुंचे ? किसीने छला इन्हे ? क्या हुआ ?
उसने कहा – साँस तो लेने दो दी ! फिर उसने कहना आरम्भ किया – कहा इनकी विमाता ने . जिसे ये सगी माता समझते थे . जब ये ७- ८ वर्ष के थे तो कैंसर से इनकी अपनी माँ की मृत्यु हो गयी थी .पिता ने दूसरा विवाह रचा लिया . और फलतः ये विमाता आ गयी . आरम्भ में माता सदृश स्नेह करती थी . पर ….. . कहकर चुप हो गयी और समीर के जीवन के बारे में बताने लगी.
बाल्यकाल से ही ये मेधावी थे . तब अध्ययन ही इनका प्रमुख कार्य था . समय अपनी गति से निर्बाध गति से चलता ही रहता है . इस मध्य ये सफलता की सोपान चढ़ते गए और बहुत बड़े अधिकारी बन गए .विमाता से दो भाई भी हुए . वे औसत बुद्धि के थे . अजित और सुजीत नाम था . अपने दोनों भाइयों को पढ़ाने का प्रयास किया लेकिन असफल ही रहे.
समीर ने अपने परिश्रम के बल पर हवेली तथा गाड़ियाँ खरीदी . भाइयों को भी छोटा मोटा व्यापर करने के लिए पैसे दिए. संपूर्ण परिवार संतुष्ट और प्रसन्न थे . विशेषकर उनके पिताजी ऐसे सपूत को प्राप्त कर गौरव का अनुभव करते थे .
ऐसा कहा जाता है कि जीवन में यदि सबकुछ आराम से चलता हो तो मानव को सतर्क हो जाना चाहिए . एक दिन परिवार के सभी सदस्य सिनेमा देखकर देर रात को लौट कर घर आये , इसलिए सोने में थोड़ी देर हो गयी थी . अचानक कराहने की आवाज़ से समीर की नींद खुल गयी . पिताजी के कमरे से आवाज़ सुनकर कमरे में गए तो पिता को कराहते देखा . उनसे पूछने पर पता चला कि उनके ह्रदय में दर्द हो रहा है . डॉ . को बुलाया गया , डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया. मरने से पूर्व इतना ही कह पाये थे ‘बच’ . सारा परिवार शोक में डूब गया ,समीर तो अन्दर से टूट गए . लेकिन माँ के कारण धैर्य धारण कर लिया . अपना कष्ट भूलकर माँ को सँभालने का प्रयत्न करने लगे .
पर धीरे – धिरे माँ का व्ययवहार परिवर्तित होने लगा . बात बात में नाराज़ होना , समीर की उपेक्षा करना . आरम्भ में तो सबको प्रतीत हुआ कि अकस्मात् व असमय जीवन साथी के गुजरने के कारण ऐसा अशोभनीय व्यवहार कर रही हैं . लेकिन यह सिल सिला तो दिन प्रतिदिन बढ़ता ही गया . सदा ताने देना, दिन रात पैसे की मांग करना और अनावश्यक परेशान करना नित्य की कलह हो गयी. पैसे की माँग सुरसा के मुख की तरह बढ़ता ही गया . माँग पूरी करने हेतु समीर को अतिरिक्त अर्थ चाहिए थी तो वह घूस लेने लगे .
उसने यह भी कहा सम्भववतः दीदी समीर के पिता को सत्यता का पता लग गया होगा इसलिए पुत्र को सावधान कर रहे होंगे अतः ‘बचना’ के स्थान पर ‘ बच ‘ बोल कर बेटे को सावधान करना चाहते होंगे.
उनकी लालची माँ उनकी शादी नहीं होने देती थी . उनके ऑफिस में एक दीपा नाम की लड़की ने ज्वाइन किया . पहली नज़र में ही पसन्द आ गयी और प्यार हो गया समीर को . धीरे धीरे मेल जोल बढ़ा और दोनों विवाह बन्धन में बंधने को राज़ी हो गए . एक दिन दीपा को माँ से मिलवाने ले गए . पहले तो माँ ने अस्वीकार कर दीया लेकिन समीर के बार बार आग्रह करने से राज़ी हो गयीं . विवाह की तिथि भी निश्चित हो गयी .विवाह के पूर्व संध्या पर किसी के शिकायत पर भ्रष्टाचार के आरोप में समीर को गिरफ़्तार कर लिया गया तथा तीन साल की सजा दे दिया गया . दीपा के पिता को जब ज्ञात हुआ तो उन्होंने सगाई तोड़ दिया , और बेटी की शादी अन्यत्र करवा दिया . तीन साल बाद जब समीर को रिहा किया गया तो घर में किसी ने बात तक नहीं की. संपूर्ण जायदाद से बेदखल कर दिया गया था. विमाता ने फूटी कौड़ी भी नहीं दी गलती इनकी भी थी कि इन्होने अपनी सारी चल- अचल सम्पत्ति अपनी माँ तथा अपने भाइयों के नाम कर दी थी . फिर भी हिम्मत नहीं हारी . पुनः नए तरह से जीवन जीने की सोची ,समीर के दोस्त मिलने आये और कहा पता है ,पुलिस को किसने सूचित किया था ? इन्होंने पूछा किसने ? दोस्त ने कहा चाची, यानी तेरी माँ ने . इस सदमा से वे बेसुध हो गए . बेसुध अवस्था में ये झोंपड़ी के पास हमें मिले. मेरे पापा इन्हें अंदर लाये , होश आने पर बस इतना ही बोल पाये – मेरी माँ ने छला . तीन साल व्यतीत हो गए उस घटना को . लेकिन ये ऐसे ही हैं . हाँ आवश्यकतानुसार दैनिक क्रिया कर लेते हैं , लेकिन मात्र इतना ही बोलते हैं – मेरी माँ ने छला मुझे . इन्हें देखकर तरस आता हैं मुझे दी , भावना ने कहा . शायद रुआंसी हो गयी थी , फिर संभलकर पुनः कहने लगी – मैं ही खाना देती हूँ , इनका कार्य करती हूँ , अपने पापा से कहकर झोंपड़ी दिलवाई , मेरा घर भी समीप ही है . मैं इंजीनियरिंग कर रही हूँ . दीदी दुआ करो की ये स्वस्थ हो जाएँ .
पता नहीं दी क्यों आप मुझे अपनी सी लगने लगी हो . तुमसे अपनापन अनुभव होने लगा है इसलिए जीवन में पहली बार कह रही हूँ कि मुझे समीर से प्यार हो गया है . पता नहीं ये ठीक होंगे भी कि नहीं . मेरे माता पिता सुनकर क्या कहेंगे , लेकिन आजीवन मैं इनकी प्रतीक्षा करूंगी , एक जन्म क्या जन्म -जमान्तर तक इनकी राह तकूँगी . कहकर लज्जानवत दृष्टि झुका ली . मैंने ध्यान से देखा अश्रुपूरित नयन में मृगनयनी सी प्रतीत हो रही थी . मैं स्वयं ही इस अजीब प्रेम को देखकर व सुनकर अचम्भित थी . उसे मूक आशीर्वाद देकर सर पर हाथ रखकर ईश्वर से मन ही मन प्रार्थना करने लगी कि-हे ईश्वर ! इसकी फ़रियाद सुन लेना.
बातों में समय का ध्यान ही नहीं रहा रात्रि के ९ बज गए थे उस निरीह बालिका को ह्रदय से लगाकर मूक आश्वासन देकर मायूस होकर अपने गंतव्य की और प्रस्थान कर दी .



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

meenakshi के द्वारा
August 28, 2015

वास्तव में बुरे काम का बुरा नतीजा चाहे जिस कारण से किया हों , काफी उचित नहीं होता . आपने बहूत अच्छा लिखा , बधाई !


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