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rajanidurgesh


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सवा सौ करोड़ का बल है हम में

Posted On: 27 Sep, 2016  
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Hindi Sahitya Junction Forum Others Others में

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युवा असंतोष

Posted On: 7 Sep, 2016  
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Politics Social Issues मेट्रो लाइफ में

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मैं सृष्टि की कृति

Posted On: 30 Aug, 2016  
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Others Religious Social Issues में

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सुंदरता और सौंदर्यप्रसाधन

Posted On: 27 Aug, 2016  
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Social Issues lifestyle न्यूज़ बर्थ में

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क्या हम आजाद हैं???

Posted On: 14 Aug, 2016  
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Others Social Issues Special Days social issues में

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जीवन पथ पर झूलता मानव

Posted On: 12 Aug, 2016  
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लोकल टिकेट में

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अन्तहीन सफर

Posted On: 7 Aug, 2016  
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Hindi Sahitya Others Social Issues मस्ती मालगाड़ी में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अहल्या पीड़िता ही थी रजनी जी । राम ने उसे दोषमुक्त करके अपना महिमामंडन ही किया । उन्होंने इन्द्र की ही नहीं, गौतम ऋषि के अपनी पत्नी के साथ किए गए अन्याय की भी भर्त्सना नहीं की । आगे चलकर स्वयं उन्होंने भी सीता के साथ ऐसा ही अन्याय किया । चाहे उन्होंने उसके लिए तथाकथित लोकरंजन का आधार बताया हो लेकिन वास्तविक कारण उनकी पुरुषोचित मानसिकता ही थी । मेरा मत है कि जब संसार और समाज न्याय-अन्याय में समुचित विभेद न कर सके तो व्यक्ति को लोकस्तुति या लोकनिंदा का विचार त्यागकर अपने अन्तःकरण को ही महत्व देना चाहिए । अहल्या अपने अन्तःकरण में तो जानती थीं कि वास्तविकता क्या थी । अतः उन्हें अपराध-बोध से ग्रसित होने की आवश्यकता ही नहीं थी । लेकिन वे अपराध-बोध से ग्रसित इसलिए हो गईं क्योंकि परिवारों में बालिकाओं के समाजीकरण के द्वारा उनमें ऐसी ही मानसिकता विकसित की जाती थी जिसमें वे पति को परमेश्वर मानकर स्वयं को ही प्रत्येक दुर्घटना के लिए उत्तरदायी समझने लगती थीं और पति में कोई दोष नहीं देखती थीं । परिवार और समाज की यह दोषपूर्ण स्थिति प्राचीन काल से आधुनिक काल तक ऐसी ही चलती आई है ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा: rajanidurgesh rajanidurgesh

लेखक किसी को ठेस तो नहीं पहुँचा रहे , किसी को अपमानित तो नहीं कर रहे , बस वे अपनी निजी राय मात्र निडरता से देना चाहते है , फिर इतनी हाय-तौबा क्यों ? इतनी राजनीति किसलिए ? कुछ लोगों का कहना है आज क्यों ?, पहले क्यों नहीं ? १९८४ में क्यों नहीं आदि आदि . अगर पहले नहीं किया तो आज नहीं कर सकते यह क्या बात हुई ? ऐसा थोड़े होता है . “जब जागो तभी सबेरा.” पूरे सम्मान सहित आपकी बात का विरोध करना चाहूंगा रजनी दुर्गेश जी ! आपने ठीक कहा जब जागो तभी सवेरा ! लेकिन ये सवेरा अभी ही क्यों निकला ? चलो मान लिया 1984 में सूरज इतना लम्बा डूब गया की सवेरा हुआ ही नही तो फिर भागलपुर के दंगे , हाशिमपुरा काण्ड , बेअंत सिंह काण्ड , इंदिरा गांधी हत्या ! लेकिन शायद इन सब दिनों सवेरा हुआ ही नही ? हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है लेकिन अवार्ड वापसी अब क्यों बंद है ?बिहार चुनाव ख़त्म और अवार्ड वापसी भी प्रोग्राम बंद ? शंका तो होती है ! अब 5 नवंबर के बाद किसी ने क्यों नही अवार्ड लौटाए ? क्या अवार्ड लौटने की कोई नसिचित तिथि घोषित की हुई थी ? मुझे लगता है ये सब इटली की महारानी के दबाव में हैं क्यूंकि अवार्ड लौटने वाले ज्यादातर महारानी के तलवे चाटने वाले साहित्यकार हैं और संभव है की इन्हें घूस भी दी गयी हो या कोई और भी लालच दिया गया हो आखिर घूस खाने और खिलाने के तो माहिर खिलाड़ी हैं महारानी और युवराज !!

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: deepak pande deepak pande

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सोनियाजी क्या थी कैसी हैं सारा हिंदुस्तान जानता है. जब तक पार्टी में पदासीन रहे तब तक ‘जय सोनियाजी’ और जब अलग कर दिए गए (कारण जो भी हो), पद से हटने के बाद ही उनमें बुराइयां क्यों दिखने लगी ? सोनियाजी सदा लाभ के पद से दूर रहीं. और वह उस परिवार से सम्बन्ध रखती हैं जो परिवार शहीदों की परिवार है. आलोचना सहने की क्षमता भी है उनमे. और शायद यह कहाबत सही है की “हवा ऊँचे मकान में ही लगाती है”. तब किताब लिखना है तो कोई भी लिख ले, और किताब लिखने से न सत्य बदलेगा न कोई लांछित ही होगा, तत्काल प्रचार और दुष्प्रचार हो सकता है.आपके इन शब्दों से सहमति है की जब तक वो कांग्रेस में रहे तब तक गुलामी करते रहे और मुंह से दो बोल नही निकले खिलाफत में !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आजकल फैशन बन गया है किताब लिखकर तथ्यों की कब्र खोदने का. नटवर जी ने कब्र खोदा और मुर्दा निकाला जो बकता है की सोनियाजी ने प्रधानमंत्री न बनकर त्याग नहीं किया था बल्कि बेटे की बात मानी थी. वाह नटवरजी वाह ! आप सबकुछ लिखिए, जो मन में आये या जो सत्य हो सब कुछ.अब तो सत्ता में भी नहीं हैं! सोनियाजी भी सत्ताधीन पार्टी में नहीं हैं! जब आप भी उन्हीं के संग थे तब तो न कुछ बोला न लिखा ! उस समय डर रहे थे क्या ? सही कहा है आपने ! उस समय वाकई नटवर सिंह जी ये सब कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाये थे ! शायद कुछ और लोग नए खुलासे करें ! सत्ता से हटे की आलोचना और सत्ताधारी की बड़ाई ! ये सब हमारे देश का रिवाज जो है ! विचारणीय रचना के लिए बधाई !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

ब्लॉग बुलेटिन की आज बुधवार ३० जुलाई २०१४ की बुलेटिन -- बेटियाँ बोझ नहीं हैं– ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... एक निवेदन--- यदि आप फेसबुक पर हैं तो कृपया ब्लॉग बुलेटिन ग्रुप से जुड़कर अपनी पोस्ट की जानकारी सबके साथ साझा करें. सादर आभार!

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

के द्वारा: rajanidurgesh rajanidurgesh

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रजनीदुर्गेष जी नमस्ते, आपने बिलकुल सही चित्र प्रस्तुत किया है मथुरा का ! कृष्ण भगवान + जन्म मथुरा खेल गोकुल नन्द के हृदय नन्दनम ! मथुरा का कंस, अपने पिता को जेल में डाल कर स्वयं गद्दी पर बैठा ! १६५८ में कही सदियों बाद औरंगजेब ने भी अपने पिता शाहजहाँ को जेल में डालकर स्वयं दिल्ली में मुग़ल सम्राट बन बैठा ! कृष्ण जी को जरासीधु ने चैन से मथुरा में नहीं रहने दिया और वे अपनी पब्लिक और राजधानी को द्वारका गुजरात ले गए ! अब तक के सभी सांसद कंस के नक्श कदमों पर चलते रहे विकास से डरते रहे, अब हेमामालिनी जी पर मथुरा की जनता ने विश्वास व्यक्त किया है और हमें यकीन ही नहीं पूरा भरोषा भी है की हेमामालिनी जी इस उपेक्षित पड़े मथूजा का जरूर उद्धार करेंगी ! सुन्दर और विस्तृत लेख के लिए साधुवाद ! हरेन्द्र जागते रहो !

के द्वारा: harirawat harirawat

के द्वारा: rajanidurgesh rajanidurgesh

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आदरणीया रजनीदुर्गेष जी ! सुप्रभात ! दिन मंगलमय हो ! आपने सही कहा है-पावन भूमि है मथुरा.परमपिता श्री कृष्ण की जन्म भूमि,लेकिन पूर्णतया उपेक्षित सी है.पुण्यसलिला यमुना नदी भी स्वच्छ नहीं है. उभड़ खावड़ कच्ची-पक्की सडके भी हैं.अब मथुरा की ही नहीं पूरे देश की दशा सुधरेगी.मथुरा की सेवा के लिए भगवान कृष्ण और मथुरावासियों को हेमामालिनी जी के रूप में एक मीरा मिल गई है.अब मथुरा का विकास जरूर होगा.आदरणीया डॉक्टर शिखा जी और शालिनी जी कांग्रेसी विचारधारा की हैं,इसीलिए कांग्रेसी चश्मे से देखकर उन्होंने कॉमेंट किया है.उनका कॉमेंट पढ़कर मुझे अफ़सोस हुआ है.ये लोग महिलाओं की स्वतंत्रता और उत्थान की बढ़चढ़कर बातें करतीं हैं,परन्तु एक महिला हेमामालिनी जी की जीत उन्हें सिर्फ इसीलिए नहीं भा रही है,क्योंकि हेमा जी कांग्रेसी नहीं हैं.बुद्धिजीवियों की सोच ऐसी संकीर्ण नहीं होनी चाहिए.एक महिला के नाते किसी महिला की जीत पर उन्हें गर्व होना चाहिए.आपकी मथुरा यात्रा पर आधारित ये लेख मुझे बहुत अच्छा लगा.आपको बहुत बहुत बधाई.भगवान श्री कृष्ण जी मेरे भी ह्रदय में बसते हैं.अब तो वो समय आने वाला है जब सारी दुनिया कहेगी-" कृष्णम वन्दे जगद्गुरुम."

के द्वारा: sadguruji sadguruji

मध्यमवर्ग की सबसे अधिक बिडम्बना है दिखावा. चाहे वे उच्च माध्यमवर्गीय हों या निम्न मध्यमवर्गीय. झूठी शान के लिए वे अपना जीवन उत्सर्ग कर रहें हैं. या तो युवा हों या बुजुर्ग समाज में सबसे दयनीय स्थिति इन्ही वर्गों की हैं. वे सांस तो ले रहे हैं लेकिन स्वच्छ हवा में नहीं. संघर्षमय जीवन ही इस वर्ग की पहचान है. बुजुर्ग की स्थिति अत्यंत ही दारुण है. सरकार ने वृद्धाश्रम जगह-जगह खोल तो रखा है लेकिन पर्याप्त नहीं है. इस वर्ग के वृद्ध आश्रम में जाना भी नहीं चाहते क्योंकि इनके बच्चों की बदनामी न हो. आर्थिक दृष्टि से कमजोर या निम्न वर्ग के मनुष्य का जीवन ही आभाव से आरम्भ होकर अंत भी तड़प-तड़प कर समाप्त हो जाता है. इनके बच्चे स्वयं ही मजदूरी या किसी तरह जीवन यापन करते हैं. इस वर्ग के वृद्धों की न तो अपेक्षा है न इच्छा. कष्टमय जीवन व्यतीत करना ही इनका भाग्य है. वृद्धजन कम से कम आँखों के सामने अपने बच्चों को देखते तो हैं. आधी पेट खा कर खाट पर लेट कर बच्चों की राह ताकना प्रातःकाल से रात्रि तक प्रतीक्षा में ही व्यतीत हो जाता है. लेकिन बच्चों के दुःख तथा स्वयं की असमर्थता में तिल-तिल कर मरते रहते हैं. आशय यह है कि कोई भी वर्ग हो अधिकांश वृद्ध की स्थिति चिंतनीय ही है! संकल्प शक्ति जरुरी है हर काम के लिए ! बहुत सार्थक लिखा है आपने आदरणीय दुर्गेश जी !

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के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

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अब हमारी बेटियां निर्भया हो कर सांस तो ले पायेगी. दामिनी की तरह बलिदान तो नहीं देना होगा. आज दामिनी जहाँ भी होगी उसे संतोष हुआ होगा कि उसके साथ अन्याय करने वालों को दंड तो मिला. उसके माता-पिता को थोड़ी शांति तो मिली होगी. खैर उनके विषय में लिखने से भी मेरा मन क्लांत हो रहा है, उनकर दर्द का तो कोई हिसाब ही नहीं . उन्होंने तो बेटी खोई है, जिगर का टुकड़ा खोया है वह भी इतनी त्रासदी के साथ. उस कल घडी का तो कुछ नहीं हो सकता. उनकी लाडली को तो लौटाया नहीं जा सकता है. मगर आरोपियों को दंड दे कर देश ने श्रद्धांजलि दी है. दामिनी को न्याय मिलना बहुत बड़ी जीत ककही जा सकती है किन्तु अभी ऐसी हजारों दमनैयाँ इंतज़ार में हैं की कोई उनकी भी सुने ! बेहतरीन आलेख सीमा जी !

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इस तरह की मानसिकता वाले हरेक क्षेत्र में मिल जाते हैं. चाहे ऑफिस हो , या ऑफिस में बॉस के नज़र में अच्छा बनने के चक्कर में कलिग के साथ धोखाधरी करने वाले , दो सहेलियों के बीच दरार डालने वाले, सास-बहू में तकरार करने वाले , पति-पत्नी के बीच में गलतफहमी ये सारे कर्म करने वाले दोहरी मानसिकता वाले ही तो हैं. हम तो दहेज़-प्रथा, बाल-विवाह इत्यादि का विरोध करते हैं लेकिन दोहरे मानसिकता वाले लोगों को नज़र-अंदाज कर देते हैं. कोढ़ की तरह फैले ऐसे मानसिकता वालों से अपनी रक्षा करनी चाहिए. समाज को बचाना चाहिए. ऐसे विकृत सोच वाले मानव को मनोचिकित्सक से उपचार करवाना चाहिए. हा सब का यह पुनीत कर्तव्य है कि दोहरे मानसिकता वाले व्यक्ति से स्वयं कि रक्षा करते हुए समाज में फैले इस गन्दगी रूपी भयानक बीमारी से मुक्त कराना चाहिए. बिलकुल सही कहा आपने ! समाज दूषित हो चूका है !

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के द्वारा: sanjeev verma sanjeev verma

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के द्वारा: nishamittal nishamittal

रजनी जी, हम और आप चाहे जितनी बहस करलें, किन्तु हकीकत यही है की समाज में शायद ही हमारी और आपकी बातों से किसी की आँखें खुलें, जब व्यक्ति ऐसे डोंगी बाबाओं, देवियों, पाखंडियों के द्वारा ठगा जाता है, तभी कुछ लोगों की आँखे खुलती है किन्तु कुछ लोग फिर भी एक को ढोंगी मानकर दुसरे के पास जाकर लुटने को तैयार हो जाते हैं.....आज कल लोग भक्ति ह्रदय से नहीं, भय के कारण करने लगे हैं और ऐसे ढोंगी लोग लोगों को डरवाने में माहिर होते हैं, उनपर विशवास नहीं करेंगे तो आप का बुरा हो जाएगा....और कौन व्यक्ति अपना बुरा चाहेगा ? इससे अच्छा तो वे अन्धविश्वासी होना ही समझते हैं! किन्तु उन्हें बाद में ठगे जाने पर ही एहसास हो पाता है की अमुक व्यक्ति ढोंगी था....दोष तो हमारी शिक्षा पद्धति का भी है जो हमें वैज्ञानिक सोंच नहीं दे पाती.... http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/09/19/girlsvsboys/

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

दुनिया सिर्फ सच्चाई पर नही चलती है । बहुत से जुठ है जो समाज के लिए जरूरी है । राज्य व्यवस्था पहले से ही जुठे लोगों ने ही चलाई है । लेकिन उस के बिना भी नही चलता । आदमी को प्राणी से ईन्सान बनाने के लिए धर्म और ईश्वर को बनाया गया । वो भी जुठ था । लेकिन जरूरी था । आज आदमी के पास थोडी बहुत नैतिकता बची है वो धार्मिक संस्कारों के कारण है । आदमी अपने आप को चाहे कितना नास्तिक समज ले, लेकिन उस के मांबाप के संस्कार है उस में जीस से वो नैतिक बना रह सकता है । आप उलजन में पड गई, मुर्ति माता है या वो जीवित नारी ? हकिकत मे तो कोइ भी माता नही थी । एक रियाज होता है । गायक अपना गला सुरमें रखने के लिए घरमें अकेला अकेला गाता रहता है । ऐसे ही ईन्सान को ईन्सान बने रहने के लिए धार्मिक प्रव्रुति किये जानी पडती है । प्रव्रुति तो प्रव्रुति होती है । अनेक रंग होते हैं । उस में कुछ अच्छा भी होता है कुछ बूरा भी होता है । आदमी रोजगार के अलावा बहुत सारी प्रव्रुति कर लेता है । मनोरंजन, खेल, घुमना फिरना । सब प्रव्रुतियां विकसित हो गई है, ईकोनोमी का भाग बन गई है । धर्म को अलग से नही देखना चाहीए । सब में बूराई है तो ईस में भी है । "सब में बूराई चलती है धर्ममें नही चलती" ये कथन धर्म का जीसे अहोभाव है वोही बोल सकता है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

रजनी जी सादर नमस्कार, अतः ज़माने की दुहाई न दें. आपकी बात से मै सहमत भी हूँ और असहमत भी. यह मानना की अपने जमाने की बातों के नाम पर बच्चों की आजादी छिनी जा रही है यह कहना बहुत ठीक नहीं है. कई ऐसे मसलें हैं की तब और आज भी हमारे समाज में उनका वही मूल्य है मसलन दादा दादी या नाना नानी के पैर छूकर आशीर्वाद लेना, आजकल बच्चे माता पिता को तो हाय हाय करके निकल ही जाते हैं और किसी बड़े के चरणस्पर्श करने की बात पर तो किनारे से खिसकने की कोशिश करते हैं क्या यहाँ बच्चों द्वारा चरणस्पर्श करने को बेकवर्ड कहना और उनके जमाने में इसे शर्मिंदगी के कार्य कहने पर आप सहमति देंगी? शायद नहीं. हाँ मगर मै आपकी इस बात से सहमत हूँ की छोटी छोटी बातों पर या अपने निजी स्वार्थ के कारण इस प्रकार का उलाहना देना ठीक नहीं है.

के द्वारा: akraktale akraktale

रजनी जी सादर नमस्कार, बहुत ही विचित्र घटना का वर्णन आपने प्रस्तुत किया है, कई बार पढने में आता है की बड़ी बहन के स्वर्गवास के कारण छोटी की शादी उस घर में कर दी गयी, आपने बड़ी और छोटी बहनों के विवाह की जैसी घटना के बारे में जिक्र किया है निसंदेह ऐसी घटनाओं के बारे में भी पढ़ा है मगर बहुत ही कम. जाने कैसे विचित्र लोग होते है, सोचकर ही ग्लानी होती है ऐसे लोगों के प्रति. उस माँ के प्रति सोचकर ही गर्व होता है जिसने कठोर निर्णय लिया और अपने बेटे को अपने पाँव पर खडा किया. यकीनन उसे कदम कदम पर कठिनाई का सामना करना पडा होगा. बेटे ने माँ को अपने साथ रखने का जो फैसला लिया उस पर मै यही कहूँगा की बेटे ने भी अपना फर्ज पूरा करने में कोई कोताही नहीं की है. बहुत प्रेरणादायक आलेख. साधुवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

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रजनी जी सादर नमस्कार, प्रथम तो वृद्ध माताजी को उनके पुण्यकर्म के लिए नमन और फिर आपकी सकारात्मक सोच को नमन. बहुत अच्छा विचार है असहाय लोगों की मदत करना, किन्तु हकीकत ये है की हम चाहते बहुत हैं मगर कर नहीं पाते कभी बहुत हुआ तो एक मोटी सी रकम देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं. अगर आप बुरा ना माने तो मै कहना चाहता हूँ की बहुत नहीं किन्तु एक दिन किसी असहाय लोगों या विकलांग लोगों के केंद्र को पहले से सूचित कर उनके लिए खाना ले जाना प्रेम से उन्हें खिलाना और एक दिन उनके साथ बिताना भी आपको बहुत सुकून देगा. वर्षभर में कई ऐसे अवसर आते भी हैं जब हमें ऐसा करके अधिक सुकून महसूस होगा.

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वहम -एक परेशानी !! रजनी जी आपके विचार पढ़े / तथा में आपकी बात से सहमत हूँ कि ये एक तरह का छोटा मोटा सा मन का रोग हें / और इसी लिए लोग छोटा मोटा सा टोटका करतें हें / बचपन में आपने देखा होगा गावं में बच्चे की नजर उतारने के लिए सुखी मिर्च बच्चे को छुवा कर चूल्हें में फेंकते थे / में मानता हूँ ये बहम हें पर यदि इससे मन शांत होता हें तो बुराई क्या हें / मेरा बचपन भी रूडकी का पास के गावं में काश्तकारी में बीता / बरसात में जब लोकी . कद्दू , तोरी की बेलें पर हमारे घेर में फुल के बाद निहर ( लोकी कद्दू , तोरी के फल ) तो हम माता श्री को उंगली कर के बताते थे कि देखो वो निहर लगा हें तो माता श्री कहती थी कि उंगली नहीं करते ये मर जाएगा / और शायद मेने ये महसूस भी किया या इतीफाकन कोई कोई मर भी जाते थे / झुई मुई का पेड़ छूने से मुरझा जाता हें / इस प्रकार छोटा मोटा कुछ करने से यदि मन शांत होता हें तो बुराई क्या हें / इस प्रशन का उत्तर कोई मनोचिकित्सक दे सकता हें / ऐसे करने से मन की शक्ती बढ़ती हें / फिर भी बहम में नहीं पढ़ना चाहिय्र/ में आपकी बात से सहमत हूँ

के द्वारा: satish3840 satish3840




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